अंबिकापुर अग्निकांड: 72 घंटे बाद मुकेश–प्रवीण अग्रवाल पर दर्ज FIR, अवैध पटाखा भंडारण पर उठे सवाल : Ambikapur Fire Tragedy

Uday Diwakar
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Ambikapur Fire Tragedy: सरगुजा:​​​अंबिकापुर: 26 अप्रैल 2026:  छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर शहर में राम मंदिर रोड इलाके में लगी भीषण आग अब कानूनी और नैतिक सवालों के घेरे में है। घटना के लगभग 72 घंटे बाद पुलिस ने पटाखा एवं प्लास्टिक व्यापारी मुकेश अग्रवाल और प्रवीण अग्रवाल के खिलाफ कोतवाली थाने में प्राथमिकी दर्ज कर ली है, जिससे यह तस्दीक होती है कि रिहायशी इलाके में अवैध रूप से किया जा रहा पटाखा भंडारण और नियमों की दुर्गापूर्ति अब निशाने पर है।

अंबिकापुर के राम मंदिर रोड स्थित मुकेश पटाखा व प्लास्टिक दुकान परिसर में लगी आग लगभग 15–18 घंटे तक धधकती रही, जिससे भव्य लपटें और विस्फोट की ध्वनि पूरे मोहल्ले में गूंजती रही। आग इतनी तेज थी कि कई दमकल वाहन भी इसे बुझाने में घंटों तक जुटे रहे। आस‑पास के 6–7 घर आग की चपेट में आए, कई दीवारें ढह गईं, मकानों की छत और फर्नीचर जलकर खाक हो गए। प्रभावित परिवारों ने बताया कि घबराकर लोगों ने खुद अपने घरों की दीवारें और संरचनाएं तक तोड़ दीं ताकि दमकल को रास्ता मिल सके।

पीड़ितों का आरोप है कि संकरी राम मंदिर रोड पर स्थित इस दुकान में लंबे समय से बड़ी मात्रा में पटाखे और प्लास्टिक सामग्री का अवैध भंडारण किया जा रहा था, जबकि आवासीय क्षेत्र होने के कारण यहां ऐसा खतरनाक गोदाम न रखने का प्रावधान बना होता है। आग लगने के बाद लोगों ने दरवाजे–खिड़कियां तोड़कर भीतर घुसने की कोशिश की, लेकिन तेज ज्वाला और धुआं के कारण कई बार वापस लौटना पड़ा।

72 घंटे में FIR तक क्या हुआ?

अग्निकांड के बाद प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की तरफ से सबसे पहले चर्चा “मुआवजा” और “मदद” की रही। कई दिन तक यह चर्चा रही कि आग लगने की जानकारी दमकल तक कितनी देर से पहुंची, क्यों कुछ घंटे तक इसे बुझाना मुश्किल रहा और आस‑पास की संकरी गलियां राहत अभियान के लिए कितनी अवरोधक साबित हुईं। इस बीच प्रभावित परिवारों ने व्यापारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई, जिसे लगभग 72 घंटे बाद पड़ोसी प्रफुल्ल पाण्डेय की शिकायत पर FIR के रूप में दर्ज किया गया।

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पुलिस ने मुकेश अग्रवाल और प्रवीण अग्रवाल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 125 (मानवीय जीवन के लिए खतरा पैदा करना), 279 (खतरनाक रूप से वाहन चलाना) और 287 (किसी भी चीज को खतरनाक रूप से रखना) के तहत अपराध दर्ज किया है। इसके अलावा अन्य अपराध भी बाद में जोड़े जा सकते हैं, खासकर तब जब विशेष जांच दल की रिपोर्ट आएगी।

अवैध पटाखा भंडारण पर सवाल

इस हादसे ने अवैध पटाखा भंडारण और लाइसेंस‑प्रक्रिया की कमजोरी को उजागर किया है। नगर निगम क्षेत्र में स्थित मुकेश पटाखा गोदाम की जांच के लिए अब एक विशेष समिति गठित की गई है, जो 15 दिनों में अपनी रिपोर्ट देने के दायित्व पर है। नगर निगम सामान्य सभा में नेता प्रतिपक्ष ने भी सवाल उठाए कि आखिर ऐसे घनी आबादी वाले क्षेत्र में नगर निगम और जिला प्रशासन की मंजूरी से यह पटाखा गोदाम कैसे चल रहा था और क्या इसके लिए वैधानिक अनुमति थी या नहीं।

पीड़ितों के अनुसार दुकान में पटाखे न सिर्फ भंडारित, बल्कि एक‑दूसरे के साथ ढेरित रखे जाते थे, जिससे आग लगने पर विस्फोट की संभावना और बढ़ जाती है। उनका आरोप है कि लंबे समय से आस‑पास के लोगों ने नगर निगम और स्थानीय प्रशासन के सामने इस खतरे को उठाया, लेकिन उचित कार्रवाई नहीं हुई। अब लोग पूछ रहे हैं कि क्या यह एक “दुर्घटना” थी या लापरवाही और नियम तोड़ने का सीधा परिणाम।

Ambikapur Fire Tragedy

अग्निकांड के बाद अंबिकापुर की राजनीतिक हलचल तेज हो गई। कांग्रेस ने प्रभावित परिवारों को मुआवजा और व्यापारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। पार्टी ने साफ कहा कि यदि आरोपी व्यवसायी को बचाया गया तो आंदोलन किया जाएगा।

इस मामले में विधायक और मंत्री के बयानों को लेकर भी विवाद पैदा हुआ। जहां कुछ नेता पटाखे के भंडारण को लेकर दैनिक बयान दे रहे थे, वहीं पीड़ितों ने उन बयानों को “असत्य” और “जनता को भड़काने वाला” बताया। इस संदर्भ में आम जनता में यह भावना तेज है कि अगर नियम बिना रियायत के लागू होते तो शायद यह आग उतनी तबाही नहीं मचा पाती।

अब जांच दो तरह से चल रही है। एक तरफ पुलिस और विशेष जांच दल यह तय करेंगे कि आग किस कारण लगी, लाइसेंस प्रक्रिया में कितनी लापरवाही हुई और किन अधिकारियों की भूमिका रही। दूसरी तरफ नगर निगम और जिला प्रशासन की जांच समिति यह देखेगी कि भविष्य में ऐसे खतरनाक गोदामों को रिहायशी क्षेत्रों से कैसे दूर रखा जाए, परमिट‑नियमन की व्यवस्था कितनी कड़ी होनी चाहिए और किस स्तर की निगरानी की जाए।

अंबिकापुर अग्निकांड अब सिर्फ एक स्थानीय घटना से कहीं आगे बढ़ चुका है। यह शहर के नियोजन, नगरपालिका प्रशासन, अवैध भंडारण और राजनीतिक‑ब्यूरोक्रेटिक जवाबदेही पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है कि अगली बार ऐसी आग से जान‑माल की रक्षा कैसे सुनिश्चित होगी।

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