Elephant Menace in Mainpat: सरगुजा:अंबिकापुर:9 मई 2026: मैनपाट। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मैनपाट क्षेत्र में हाथियों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। जंगली हाथियों के झुंड ने कई गांवों में दहशत का माहौल बना दिया है। हाथी न केवल ग्रामीणों के घरों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, बल्कि खेतों में रखे अनाज को भी चट कर जा रहे हैं। स्थिति यह है कि लोग रातभर जागकर अपने घरों और फसलों की रखवाली करने को मजबूर हैं। वन विभाग की सतर्कता के बावजूद ग्रामीणों में भय और नाराजगी दोनों बनी हुई है।
मिली जानकारी के अनुसार, पिछले कुछ दिनों से हाथियों का दल मैनपाट के अलग-अलग इलाकों में लगातार घूम रहा है। रात होते ही हाथी रिहायशी बस्तियों की ओर पहुंच रहे हैं और मौका मिलते ही घरों की दीवारें तोड़कर अंदर रखे धान, चावल और अन्य अनाज को खा जा रहे हैं। कई जगहों पर बोरियों में भरा अनाज भी बर्बाद हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि हाथियों के डर से बच्चे और बुजुर्ग पूरी रात सो नहीं पा रहे हैं। हर किसी को यही चिंता सताती रहती है कि कहीं हाथियों का झुंड फिर गांव में न घुस आए।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, हाथियों का उत्पात सिर्फ एक-दो घरों तक सीमित नहीं है, बल्कि कई परिवार इसकी चपेट में आ चुके हैं। जिन घरों पर हाथियों ने हमला किया, वहां दीवारें टूट गईं, छप्पर क्षतिग्रस्त हो गए और घर के बाहर रखा सामान भी नष्ट हो गया। कुछ स्थानों पर हाथियों ने कच्चे मकानों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। ऐसे में जिन परिवारों के पास सीमित संसाधन हैं, उनके सामने अब रहने और खाने दोनों का संकट खड़ा हो गया है।
ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग को कई बार सूचना दी गई, लेकिन हाथियों की लगातार आवाजाही को पूरी तरह रोका नहीं जा सका। कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि विभागीय टीम केवल सूचना मिलने पर पहुंचती है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। वहीं वन विभाग के अधिकारी लोगों को सतर्क रहने, रात में समूह बनाकर जागने और हाथियों के नजदीक न जाने की सलाह दे रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है और टीम लगातार प्रभावित इलाकों में गश्त कर रही है।
मैनपाट जैसे वनांचल क्षेत्र में मानव और वन्यजीव संघर्ष की समस्या नई नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में यह संकट ज्यादा गंभीर हुआ है। जंगलों में भोजन और पानी की कमी, आवासीय क्षेत्रों का विस्तार और वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्गों में व्यवधान को इसके प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले हाथी कभी-कभार ही गांवों के आसपास दिखते थे, लेकिन अब उनका आतंक रात-ब-रात बढ़ता जा रहा है। हाथियों के झुंड के गुजरने से खेत रौंदे जा रहे हैं, फसलें नष्ट हो रही हैं और कई परिवार आर्थिक संकट में फंस गए हैं।
Elephant Menace in Mainpat
गांवों में रात का माहौल बेहद तनावपूर्ण है। जैसे ही अंधेरा होता है, ग्रामीण लाठी, टॉर्च, ड्रम और पटाखों के सहारे हाथियों को दूर भगाने की कोशिश करते हैं। कई जगहों पर युवा समूह बनाकर पहरा दे रहे हैं, ताकि किसी भी समय हाथी आने पर शोर मचाकर उन्हें वापस जंगल की ओर खदेड़ा जा सके। लेकिन हाथियों की विशाल ताकत और अचानक हमले की वजह से लोग डरे हुए हैं। खासकर महिलाओं और बच्चों में भय का माहौल ज्यादा है।
कुछ ग्रामीणों ने बताया कि हाथियों के हमले के डर से वे रात में अपने पशुओं को भी सुरक्षित स्थान पर बांधकर रखते हैं। अगर एक बार हाथी बस्ती में घुस जाएं, तो न केवल मकान बल्कि मवेशियों की जान को भी खतरा हो सकता है। कई परिवारों ने अपने घरों के सामने अलाव जलाकर और तेज रोशनी रखकर हाथियों को दूर रखने की कोशिश की है। फिर भी, जब झुंड को खाने की तलाश होती है, तो वे किसी भी अवरोध को पार कर आगे बढ़ जाते हैं।
हाथियों के इस तरह रिहायशी इलाकों में घुसने का मतलब यह भी है कि उनके प्राकृतिक आवास और भोजन श्रृंखला पर गंभीर दबाव है। जंगलों में घटते संसाधनों की वजह से हाथी गांवों की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि, इससे मानव जीवन पर सीधा खतरा पैदा हो रहा है, इसलिए जरूरी है कि वन विभाग और प्रशासन मिलकर स्थायी रणनीति बनाएं। इसमें हाथियों की नियमित निगरानी, कॉरिडोर की सुरक्षा, ग्रामीणों को समय पर चेतावनी और संवेदनशील बस्तियों में त्वरित राहत व्यवस्था शामिल होनी चाहिए।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि मैनपाट के कई गांव हर साल हाथियों के आतंक से जूझते हैं, लेकिन नुकसान का मुआवजा समय पर नहीं मिल पाता। ग्रामीणों को न केवल फसल और घर का नुकसान उठाना पड़ता है, बल्कि मानसिक तनाव भी झेलना पड़ता है। कई परिवारों के लिए यह स्थिति जीवन-मरण का सवाल बन गई है। जनप्रतिनिधियों ने सरकार से मांग की है कि प्रभावित इलाकों में स्थायी रोकथाम की व्यवस्था की जाए और पीड़ित परिवारों को शीघ्र सहायता दी जाए।
मैनपाट की भौगोलिक स्थिति भी इस समस्या को और जटिल बनाती है। यह क्षेत्र घने जंगलों, पहाड़ी रास्तों और बिखरी बस्तियों वाला इलाका है, जहां हाथियों की आवाजाही को नियंत्रित करना आसान नहीं होता। जंगल और गांवों के बीच की दूरी कम होने के कारण हाथी अक्सर बस्तियों तक पहुंच जाते हैं।जब तक मानव बस्तियों और वन क्षेत्र के बीच स्पष्ट सुरक्षा घेरा नहीं बनाया जाएगा, तब तक इस तरह की घटनाओं को रोकना मुश्किल रहेगा।
ग्रामीणों ने कहा कि अब वे हर रात भय के साए में जी रहे हैं। बच्चों को जल्दी सुला दिया जाता है, बुजुर्गों को घर के अंदर रखा जाता है और युवा पूरी रात निगरानी करते हैं। हाथियों की आहट मिलते ही लोग शोर मचाकर एक-दूसरे को सतर्क करते हैं। कई बार रातभर जागना उनकी मजबूरी बन गई है। खेतों और घरों की सुरक्षा के लिए लोग अपनी नींद, चैन और दिनचर्या सब कुछ गंवा चुके हैं।
फिलहाल मैनपाट में हाथियों का यह आतंक थमता नहीं दिख रहा है। ग्रामीणों की उम्मीद अब प्रशासन और वन विभाग की सक्रियता पर टिकी है। उन्हें भरोसा है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में नुकसान और बढ़ सकता है। हाथियों के इस उत्पात ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। जब तक इसका प्रभावी समाधान नहीं निकलता, तब तक मैनपाट के ग्रामीण रातभर पहरे पर खड़े रहने को मजबूर रहेंगे।
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