छत्तीसगढ़ के केते कोल ब्लॉक को वन मंजूरी पर सस्पेंस, अदानी MDO बनेगी, स्थानीय विरोध तेज, टीएस सिंह देव की बड़ी चेतावनी : Suspense Surrounds Forest Clearance for Chhattisgarhs Kete Coal Block

Uday Diwakar
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Suspense Surrounds Forest Clearance for Chhattisgarhs Kete Coal Block: सरगुजा:​​​अंबिकापुर:9 मई 2026: छत्तीसगढ़ के केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को लेकर आज नई दिल्ली में केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (FAC) की बैठक अहम मानी जा रही है, जिसमें वन स्वीकृति पर निर्णय की संभावना है। इस परियोजना को लेकर हसदेव अरण्य क्षेत्र में स्थानीय विरोध तेज है और टीएस सिंह देव ने इसे रामगढ़ पहाड़, हसदेव जंगल और आदिवासी हितों के लिए गंभीर खतरा बताया है।

छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में प्रस्तावित केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक एक बार फिर सुर्खियों में है। केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (FAC) की नई दिल्ली में होने वाली बैठक में इस परियोजना को वन स्वीकृति देने के मुद्दे पर विचार किया जा रहा है। राज्य सरकार पहले ही केंद्र को अपनी अनुशंसा भेज चुकी है, जिसके बाद अब अंतिम निर्णय की दिशा में आगे बढ़ने की चर्चा तेज हो गई है।

Suspense Surrounds Forest Clearance for Chhattisgarhs Kete Coal Block

यह कोल ब्लॉक राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को आवंटित है और इसे अदानी समूह द्वारा एमडीओ (माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर) के रूप में विकसित और संचालित किए जाने की योजना है। यही वजह है कि यह मामला केवल एक खनन परियोजना नहीं, बल्कि पर्यावरण, वनाधिकार, ऊर्जा जरूरतों और कॉरपोरेट भूमिका के टकराव का प्रतीक बन गया है।

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परियोजना के समर्थन में तर्क दिया जा रहा है कि इससे बिजली उत्पादन के लिए कोयले की आपूर्ति सुनिश्चित होगी, लेकिन विरोधी पक्ष का कहना है कि हसदेव अरण्य जैसे जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन दीर्घकालिक पर्यावरणीय नुकसान पहुंचाएगा। वर्ष 2025 में भी राज्य वन विभाग ने इस परियोजना के लिए 1742.60 हेक्टेयर वन भूमि के इस्तेमाल की अनुशंसा की थी, जिस पर कांग्रेस और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कड़ी आपत्ति जताई थी।

स्थानीय स्तर पर विरोध अब और मुखर हो गया है। हसदेव बचाओ आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता और ग्रामीण लगातार इसे जंगल, जल स्रोत, हाथी कॉरिडोर और वन्यजीवों के लिए खतरा बता रहे हैं। उनका कहना है कि खनन शुरू होने पर न सिर्फ पेड़ों की बड़ी संख्या में कटाई होगी, बल्कि आदिवासी आजीविका और क्षेत्र की पारिस्थितिकी भी गहरे संकट में पड़ जाएगी।

पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंह देव ने भी इस परियोजना पर कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने FAC से परियोजना को खारिज करने की मांग की है और कहा है कि यह फैसला रामगढ़ पहाड़ और हसदेव क्षेत्र की सांस्कृतिक तथा पर्यावरणीय विरासत पर भारी पड़ेगा। उनके बयान के बाद कांग्रेस खेमे में भी यह मुद्दा राजनीतिक रूप से और गर्म हो गया है।

सिंह देव ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर खदान को मंजूरी दी गई तो बड़ा जनआंदोलन खड़ा हो सकता है। उनके अनुसार सरकार की तरफ से जिस तरह अनुमोदन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा रही है, उससे ऐसा संदेश जा रहा है कि स्थानीय विरोध और पर्यावरणीय चेतावनियों को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया जा रहा।

यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हसदेव अरण्य को मध्य भारत के सबसे अहम वन क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां पहले से चल रही परियोजनाओं और वृक्ष कटाई को लेकर लंबे समय से विरोध जारी है। पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को मंजूरी मिलती है, तो यह क्षेत्र में खनन विस्तार का नया चरण शुरू करेगा और इसका असर दूर तक दिखाई देगा।

राजनीतिक स्तर पर यह मुद्दा सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए संवेदनशील बन गया है। एक ओर सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा और विकास से जोड़कर देख रही है, वहीं विपक्ष इसे प्रकृति, आदिवासी अधिकार और स्थानीय अस्मिता से जुड़ा सवाल बता रहा है। आने वाले दिनों में FAC के निर्णय पर न सिर्फ छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश की नजर रहने वाली है।

टीएस सिंह देव की चेतावनी, स्थानीय विरोध और हसदेव अरण्य की संवेदनशील पारिस्थितिकी को देखते हुए यह मामला अब केवल एक खनन परियोजना का नहीं रह गया है, बल्कि एक बड़े पर्यावरणीय और राजनीतिक संघर्ष का रूप ले चुका है।

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