Social Activist Takes Charge—Unique Protest on the Dilapidated Pratappur-Ambikapur Road: सूरजपुर :सूरजपुर जिले में सिस्टम की नाकामी के बीच एक सामाजिक कार्यकर्ता ने खुद ही कमान संभालकर प्रशासन और कोयला कंपनी की बेहद हताशाजनक चुप्पी के खिलाफ अनोखा आंदोलन छेड़ा है। प्रतापपुर–अंबिकापुर (खड़गवां) मार्ग इन दिनों अपनी बदहाली के कारण हर दिन चर्चा में है, जहां गोहगड़ नाला से केरता तक का हिस्सा बड़े‑बड़े गड्ढों से भर चुका है। यह नेशनल हाईवे‑जैसा मार्ग आम राहगीरों के लिए अब जानलेवा बन चुका है, लेकिन प्रशासन और एसईसीएल (SECL) प्रबंधन दर्शक बने दूर खड़े हैं। इसी निराशाजनक स्थिति में स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता ने एक अनोखा सामाजिक प्रदर्शन कर लोगों की नजर इस मार्ग की बर्बर दुर्दशा की ओर खींची है।
प्रतापपुर–अंबिकापुर मार्ग विशेष रूप से गोहगड़ नाला से केरता के बीच के हिस्से में बड़े‑बड़े गड्ढे और टूटी सड़क की वजह से दिन‑रात दुर्घटनाएं हो रही हैं। लोगों का कहना है कि महीनों से यहां या तो निर्माण कार्य रुका हुआ है या फिर एक अधूरी मरम्मत के बाद सड़क को फिर खुला छोड़ दिया गया है। दोपहिया वाहन चालकों को रात के समय यहां से गुजरना बहुत जोखिम भरा है, क्योंकि गड्ढे अंधेरे में रह‑रहाकर वाहन को निगल लेते हैं। कई बार बाइक सवार अचानक गड्ढे में पैर रखकर नीचे गिर जाते हैं, जिससे टांग, कोहनी और कलाई में फ्रैक्चर आने की घटनाएं सामने आती रहती हैं।
इस मार्ग की दुर्दशा का मुख्य कारण यहां संचालित ‘महान‑तीन’ कोयला खदानों से होने वाला भारी परिवहन माना जा रहा है। सुबह से लेकर रात तक सैकड़ों ट्रक और ओवरलोड वाहन इसी रास्ते से गुजरते हैं, जिनके चक्कों ने न केवल सड़क की बेसिंग को खोखला कर दिया है, बल्कि ऊपर की ढलाई को भी कई बार उखाड़ दिया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि भारी कोयला ट्रैफिक इन दिनों पूरी तरह सड़क पर ही दिखाई देता है, तो इसका मतलब यह है कि यहां जरूरी रखरखाव कार्य नहीं हो रहे। वे आरोप लगाते हैं कि एसईसीएल और संबंधित निर्माण विभाग के बीच जिम्मेदारी का खेल चल रहा है, जिसके कारण आम जनता का जीवन खतरे में पड़ रहा है।
सड़क की बदहाली को लेकर लोगों ने बार‑बार शिकायत की है, लेकिन सूरजपुर प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन दोनों ही इस मामले में मूकदर्शक बने हुए हैं। आम जनता की तकलीफों को दूर करने के लिए न तो ठोस योजना बनती दिख रही है और न ही कोई तत्काल जांच या निरीक्षण की कार्रवाई हो रही है। कई बार तो लोगों को यह जवाब सुनना पड़ा है कि “फंड या अनुमति अभी नहीं आई है”, जबकि रास्ता रोज खूनी साबित हो रहा है। इस उदासीनता से निराश होकर लोगों का विश्वास धीरे‑धीरे सरकारी यंत्र के लिए खत्म होता जा रहा है।
Social Activist Takes Charge—Unique Protest on the Dilapidated Pratappur-Ambikapur Road
इसी उथल‑पुथल के बीच सूरजपुर के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने अपनी अलग तरह से आवाज उठाई। उन्होंने गोहगड़ नाला से केरता के बीच बने बड़े गड्ढों के बीच खड़े होकर जमानत‑जमानत एक छोटी टोकरी में मिट्टी और पत्थर लाकर खुद ही गड्ढा भरने का काम शुरू कर दिया। उनके साथ कुछ स्थानीय युवक भी जुड़ गए, जिन्होंने दिनभर छोटे‑छोटे गड्ढों को भरने की कोशिश की। इसे लोगों ने “सिस्टम फेल” के खिलाफ अनोखा शांतिपूर्ण प्रदर्शन कहा। सामाजिक कार्यकर्ता ने माइक उठाकर राहगीरों से अपील की कि जब तक बड़े स्तर पर कोई सुधार नहीं होता, तब तक यह छोटी छोटी कोशिश सड़क की दुर्गति को थोड़ी कम कर सकती है।
इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य दोहरा था। पहला, यह जनता को यह बताना कि यदि सिस्टम फेल हो जाए, तो आम नागरिक भी खुद कुछ न कुछ कर सकते हैं। दूसरा, स्थानीय प्रशासन और एसईसीएल के सामने यह आवाज उठाना कि अरबों का मुनाफा कमाने वाली कोयला कंपनी की सामाजिक जिम्मेदारी केवल फाइलों में दर्ज न हो, बल्कि वास्तविक राहगीरों की सुरक्षा के रूप में सामने आए। प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ता ने कहा कि अगर एक–दो दिन में गड्ढे को भर दिया जाए, तो यह अस्थायी नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले निर्माण और रखरखाव की जरूरत है।
लोगों ने क्या कहा?
स्थानीय व्यापारी और किसानों ने बताया कि इस मार्ग की दुर्दशा के कारण उनकी आमदनी भी प्रभावित हो रही है। कई बार भारी वाहन गड्ढों में फंस जाते हैं, जिससे अन्न, सब्जी, दूध और अन्य सामान पहुंचने में देर हो जाती है। डाक और अन्य सरकारी सेवाओं का वाहन भी यहां गड्ढों में फंसकर घंटों रुक जाता है, जिससे आम उपभोक्ता अपने कामकाज में देरी के शिकार होते हैं। लोगों ने मांग की है कि सड़क की गहरी जांच के बाद एक बार फिर से डामरीकरण या बीटूमिन बेसिंग किया जाए, ताकि भारी कोयला ट्रैफिक का दबाव भी सहन किया जा सके।
आगे क्या?
सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि यह अनोखा प्रदर्शन एक शुरुआत है, न कि अंत। वे चाहते हैं कि सूरजपुर जिला प्रशासन, एसईसीएल और लोक निर्माण विभाग के बीच एक बैठक बुलाई जाए, जिसमें स्थानीय लोगों की भी आवाज शामिल की जाए। इस बैठक के माध्यम से न केवल प्रतापपुर–अंबिकापुर मार्ग की मरम्मत की तारीख तय हो, बल्कि भविष्य में इस तरह की लापरवाही न हो।
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