Surajpur Child Labor Scandal: सूरजपुर : 13 अप्रैल 2026: छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले से बाल श्रम का एक दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है। जिले के विभिन्न क्षेत्रों में अवैध ईंट भट्ठों पर छोटे-छोटे मासूम बच्चे कड़ी मजदूरी करते नजर आ रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कई बच्चे स्कूल की यूनिफॉर्म पहने भट्ठों की आग में पसीना बहा रहे हैं, जो शिक्षा के दावों पर सवाल खड़े करता है। स्थानीय लोगों ने इसकी जानकारी दी, जिससे प्रशासन में हड़कंप मच गया।
यह मामला सूरजपुर के ग्रामीण इलाकों, खासकर भट्ठों के समूह वाले क्षेत्रों में सामने आया। 8 से 14 वर्ष की आयु के बच्चे भारी ईंटें ढोते, भट्ठे पर गारा तैयार करते और आग सुलगाते देखे गए। स्कूल ड्रेस में काम करते बच्चे गरीबी और मजबूरी की पोल खोल रहे हैं। अभिभावक मजदूरी के लिए बच्चों को भट्ठा मालिकों के हवाले कर देते हैं, ताकि परिवार का पेट पल सके। जिला प्रशासन के दावों के बावजूद बाल श्रम उन्मूलन अभियान कागजों तक सीमित नजर आता है।
स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भट्ठों का दौरा किया तो यह दर्दनाक सीन सामने आया। एक बच्चे ने बताया, “स्कूल से लौटते ही भट्ठे पर आ जाते हैं, वरना घर में भूखे सोना पड़ेगा।” भट्ठा मालिकों ने गरीब परिवारों को सस्ते श्रमिक के रूप में बच्चों को हायर किया। सूरजपुर जिला, जो आदिवासी बहुल है, में गरीबी और बेरोजगारी ने इस समस्या को जन्म दिया। पिछले साल भी इसी तरह के मामले सामने आए थे, लेकिन कार्रवाई ढिली रही। जिला कलेक्टर ने जांच के आदेश दिए हैं।
श्रम विभाग और चाइल्ड प्रोटेक्शन यूनिट की टीमों ने भट्ठों पर छापेमारी की योजना बनाई। प्रारंभिक रिपोर्ट में 20 से अधिक बच्चे मिले, जिन्हें भट्ठों से निकालकर सुरक्षित जगह भेजा जा रहा है। भट्ठा मालिकों पर बाल श्रम निषेध अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज होगा। बच्चे मुख्यालय के नजदीक भट्ठों पर काम कर रहे थे, जहां ट्रैक्टर-ट्रॉली से ईंटें लादने का काम चल रहा था। अभिभावकों को जागरूक करने के लिए शिविर लगाए जा रहे हैं।
Surajpur Child Labor Scandal
सूरजपुर आदिवासी बाहुल्य जिला है, जहां 40 प्रतिशत से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती है। ईंट भट्ठे मौसमी उद्योग हैं, जो अप्रैल-जून में चरम पर होते हैं। इस दौरान मजदूरों की कमी पूरी करने के लिए बच्चे लगाए जाते हैं। शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड में ये बच्चे नामांकित हैं, लेकिन उपस्थिति शून्य रहती है। एनजीओ ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ ने बताया कि सूरजपुर में 500 से अधिक बच्चे बाल श्रम का शिकार हैं। सरकार की ‘समग्र शिक्षा अभियान’ और ‘मिड-डे मील’ योजनाओं का लाभ इन्हें नहीं मिल पा रहा।
स्थानीय विधायक ने सदन में मामला उठाया और तत्काल राहत की मांग की। जिला प्रशासन ने भट्ठा संचालकों को नोटिस जारी कर बाल श्रम बंद करने को कहा। बच्चे अब आश्रय गृह में रखे गए हैं, जहां काउंसलिंग और शिक्षा पर जोर दिया जा रहा। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सख्त निर्देश जारी किए हैं। पिछले महीने ही बाल श्रम के 50 मामलों में कार्रवाई हुई थी।
यह घटना सूरजपुर प्रशासन की नाकामी को उजागर करती है। श्रम विभाग की नियमित जांच नहीं होने से अवैध भट्ठे फल-फूल रहे। पंचायत स्तर पर जागरूकता अभाव है। विशेषज्ञों का कहना है कि गरीबी उन्मूलन से ही बाल श्रम रुकेगा। सरकार ने मनरेगा और अन्य योजनाओं से परिवारों को जोड़ा, लेकिन जमीनी स्तर पर अमल कमजोर है। स्कूल ड्रेस वाली तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं, जिससे जनाक्रोश फैल गया। एनएसएस volunteers ने सर्वे शुरू किया है।
सामाजिक कार्यकर्ता मीरा वर्मा ने कहा, “बच्चों का बचपन भट्ठों की आग में जल रहा। तत्काल सख्ती जरूरी।” जिला शिक्षा अधिकारी ने स्कूलों में विशेष जांच अभियान चलाने का ऐलान किया। भविष्य में ड्रॉपआउट रोकने के लिए मॉनिटरिंग सिस्टम बनेगा। यह मामला पूरे छत्तीसगढ़ के लिए चेतावनी है। बाल श्रम मुक्त भारत का सपना साकार करने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी। प्रशासन अब सक्रिय हो गया, लेकिन बच्चों का भविष्य बचाने का समय अब भी बाकी है।
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