बलरामपुर: दुर्गेश त्रिपाठी की मेहनत से आंखों की रोशनी लौट रही, समाज में जग रही आशा : Balrampur: Thanks to Durgesh Tripathi’s efforts

Uday Diwakar
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Balrampur: Thanks to Durgesh Tripathi’s efforts: बलरामपुर:​​ बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के शंकरगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ नेत्र सहायक अधिकारी दुर्गेश त्रिपाठी अपनी निष्ठावान सेवा से दृष्टिहीन मरीजों को नई जिंदगी दे रहे हैं। उनकी मेहनत से मोतियाबिंद जैसे रोगों से पीड़ित लोग न केवल आंखों की रोशनी प्राप्त कर रहे हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता और परिवार में नई उम्मीद भी जाग रही है। यह प्रयास राष्ट्रीय अंधत्व निवारण कार्यक्रम के तहत चल रहा है, जहां दुर्गेश त्रिपाठी ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वे कर मरीजों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करा रहे हैं।

दुर्गेश त्रिपाठी का सफर 2019 से शुरू हुआ, जब वे ग्रामीण इलाकों में नेत्र जांच सर्वेक्षण के लिए पहुंचे। एक बुजुर्ग महिला बसंती के मामले में उनकी संवेदनशीलता देखने लायक रही, जिनकी दोनों आंखों का सफल ऑपरेशन कर मोतियाबिंद से मुक्ति दिलाई गई। अब तक सैकड़ों मरीजों को लाभ पहुंचा चुके दुर्गेश नियमित शिविरों और घर-घर जाकर जांच आयोजित करते हैं। जिला स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से ये प्रयास बलरामपुर के आदिवासी और दूरस्थ गांवों तक पहुंच रहे हैं।

प्रभावित परिवारों की कहानियां

दृष्टिहीनता से जूझ रहे एक परिवार की मुखिया ने बताया कि दुर्गेश त्रिपाठी की मदद से पति को ऑपरेशन के बाद दिखाई देने लगा, जिससे घर का आर्थिक बोझ कम हुआ। इसी तरह, कई युवा और बच्चे जो पढ़ाई प्रभावित हो रही थी, अब सामान्य जीवन जी रहे हैं। इन सफलताओं ने समाज में जागरूकता फैलाई है, जहां लोग स्वेच्छा से नेत्र जांच शिविरों में भाग ले रहे हैं। दुर्गेश की टीम नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. रुद्रमणि खेस और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर हजारों लोगों की जांच कर चुकी है।

दूरस्थ क्षेत्रों में पहुंचना, संसाधनों की कमी और मरीजों का डर जैसी चुनौतियां दुर्गेश को कभी नहीं रोक पाईं। वे रविवार भी काम करते हैं और मरीजों को रायपुर तक ले जाने की व्यवस्था करते हैं। जिला प्रशासन ने उनकी सेवाओं की सराहना की है, जो स्वास्थ्य विभाग की मिसाल बन गई हैं। भविष्य में और बड़े शिविर आयोजित करने की योजना है, ताकि बलरामपुर अंधत्व मुक्त जिला बने।

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Balrampur: Thanks to Durgesh Tripathi’s efforts

दुर्गेश त्रिपाठी की सेवाएं न केवल चिकित्सा प्रदान कर रही हैं, बल्कि सामाजिक बदलाव ला रही हैं। परिवारों में आत्मसम्मान बढ़ा है और आर्थिक उत्पादकता सुधरी है। स्थानीय लोग उन्हें ‘आंखों का मसीहा’ कहते हैं, जो सेवा को जीवन का उद्देश्य बना चुके हैं। यह कहानी प्रेरणा देती है कि एक व्यक्ति का समर्पण पूरे समाज को रोशन कर सकता है।

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