Former MLA’s occupation of Gochar exposed illegal lease broken after 6 years in balrampur: बलरामपुर:छत्तीसगढ़ के बलरामपुर–रामानुजगंज जिले से सामने आया यह मामला केवल एक ज़मीन विवाद नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम का एक्स-रे है जहाँ राजनीतिक रसूख के आगे कानून वर्षों तक बंधक बना रहा। ग्राम मानपुर, तहसील शंकरगढ़ की जिस भूमि को राजस्व विभाग लंबे समय तक निजी बताता रहा, वह वास्तव में सरगुजा सेटलमेंट 1944–45 के अनुसार शासकीय गोचर (चरागाह) भूमि निकली।
छह वर्षों तक चले इस विवाद का पटाक्षेप आखिरकार 12 दिसंबर 2025 को हुआ, जब अपर कलेक्टर न्यायालय, राजपुर ने अवैध पट्टा निरस्त करते हुए साफ शब्दों में कहा— यह भूमि शासकीय गोचर है, निजी स्वामित्व का दावा अवैध और निराधार है।
मामले की जड़ : गोचर को निजी बताने का खेल
स्थान : ग्राम मानपुर, तहसील शंकरगढ़
खसरा नंबर : 228/5
रकबा : 0.372 हेक्टेयर
रिकॉर्ड : सरगुजा सेटलमेंट 1944–45 में स्पष्ट रूप से गोचर दर्ज
इसके बावजूद वर्ष 2019 से एक पूर्व विधायक द्वारा भूमि पर कब्जा, कच्चा निर्माण और राजस्व अभिलेखों में हेरफेर कर निजी पट्टा दर्शाया गया। सबसे गंभीर तथ्य यह रहा कि लगातार शिकायतों के बाद भी राजस्व विभाग के अधिकारी इसे निजी भूमि बताते रहे।
राजस्व विभाग कटघरे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब—
सरगुजा सेटलमेंट में भूमि गोचर दर्ज थी
1954–55 के बाद के तहसीली अभिलेख उपलब्ध नहीं थे
पट्टे से संबंधित कोई मूल दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं किया गया
1990–91 के कथित नामांतरण की मूल प्रति गायब थी
तो फिर किस आधार पर भूमि को निजी घोषित किया गया?
क्या यह सिर्फ़ लापरवाही थी या फिर राजनीतिक संरक्षण में रचा गया सुनियोजित खेल?
जांच में क्या निकला सामने
राजस्व निरीक्षक की जांच रिपोर्ट ने कई परतें खोल दीं—
भूमि गोचर मद में दर्ज, किसी भी स्तर पर वैध पट्टा जारी होने का प्रमाण नहीं, 1990–91 का कथित पट्टा फर्जी प्रतीत, शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा सिद्ध
अपर कलेक्टर का ऐतिहासिक फैसला
दिनांक 12/12/2025 को अपर कलेक्टर न्यायालय ने— अवैध पट्टा निरस्त किया राजस्व रिकॉर्ड में तत्काल सुधार के आदेश दिए स्पष्ट किया कि यह भूमि शासकीय गोचर है। यह निर्णय सिर्फ़ एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र पर तमाचा है, जिसने वर्षों तक गलत को सही साबित करने की कोशिश की।
दोहरे मापदंडों की पोल
यह भी कड़वी सच्चाई है कि—
आम ग्रामीण गोचर पर कब्जा करे तो तुरंत बेदखली, लेकिन जब कब्जाधारी राजनीतिक रसूख वाला हो, तो फाइलें दब जाती हैं, भूमि ‘निजी’ घोषित कर दी जाती है, शिकायतकर्ता वर्षों तक दफ्तरों के चक्कर काटता है। यही वजह है कि यह मामला भूमि विवाद से आगे बढ़कर लोकतंत्र, समानता और कानून के राज का सवाल बन जाता है।
गोचर बची, पर भरोसा कब लौटेगा? फैसला स्वागत योग्य है, लेकिन सवाल अब भी ज़िंदा हैं— जिन अधिकारियों ने गोचर को निजी बताया, उन पर कार्रवाई कब?

छह साल के अवैध कब्जे की जवाबदेही कौन तय करेगा? क्या राजनीतिक संरक्षण वाले ऐसे मामलों की स्वतंत्र जांच होगी?
अगर इन सवालों के जवाब नहीं मिले, तो यह आदेश भी फाइलों में कैद एक फैसला बनकर रह जाएगा।

Former MLA’s occupation of Gochar exposed illegal lease broken after 6 years in balrampur
बलरामपुर का यह मामला एक चेतावनी है—अगर दबाव हटे, तो कानून आज भी ज़िंदा है। लकिन असली इम्तिहान अब सिस्टम का है—क्या वह इस फैसले से कुछ सीखेगा, या अगली गोचर भूमि किसी और रसूखदार के हवाले कर दी जाएगी?
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