Navodaya Vidyalaya Dongargarh Student becomes victim of harassment:राजनांदगांव : डोंगरगढ़। छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित नवोदय विद्यालय में कक्षा 6वीं के एक दिव्यांग छात्र के साथ सहपाठियों द्वारा लगातार मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का मामला सामने आया है। छात्र के पिता ने इस संबंध में एसडीएम और तहसीलदार को लिखित शिकायत दी है, जिसके बाद प्रशासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच शुरू कर दी है।

Navodaya Vidyalaya Dongargarh Student becomes victim of harassment
पीड़ित छात्र के पिता का आरोप है कि छात्र को सीनियर सहपाठियों ने इस कदर प्रताड़ित किया कि वह आत्महत्या जैसा कदम उठाने को मजबूर हो गया। आरोप है कि छात्रों ने उसके गले में रस्सी डालकर पंखे से लटकने को कहा और धमकी दी कि यदि उसने ऐसा नहीं किया तो उसका गला दबाकर मार दिया जाएगा। सौभाग्य से उस समय केयरटेकर ने समय रहते हस्तक्षेप कर छात्र की जान बचाई।
शिकायत में बताया गया है कि छात्र को कई दिनों से अलग-थलग करके उसकी किताबें, कॉपियां चोरी करने, बिस्तर गंदा करने, खाने-पीने के बर्तनों तक फेंकने जैसी अमानवीय हरकतों का सामना करना पड़ रहा था। साथ ही उसे धमकाया गया कि अगर इस सारी बात की किसी शिक्षक या अभिभावक को जानकारी दी तो उसे 50 हजार रुपये का जुर्माना भरना होगा।
वहीं छात्र की स्थिति भी बेहद संवेदनशील है। वह एक गंभीर बीमारी से जूझ रहा है, जिसमें उसकी एक आंख निकालनी पड़ी और उसमें नकली आंख लगाई गई है, जबकि दूसरी आंख से भी उसकी दृष्टि आंशिक ही है। इसके बावजूद इस छात्र ने हाल ही में ब्लॉक स्तरीय परीक्षा में टॉप कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया और 80 छात्रों की प्रतियोगिता में चौथा स्थान हासिल किया।
मामले पर डोंगरगढ़ एसडीएम एम. भार्गव ने कहा है कि छात्र के अभिभावक की शिकायत के बाद विद्यालय प्राचार्य को तलब किया गया है और मामले की जांच की जा रही है। उन्होंने कहा कि इस तरह के व्यवहार को पूरी तरह अस्वीकार किया जाता है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
यह मामला न केवल नवोदय विद्यालय की छवि को ठेस पहुंचाता है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की जांच और सुधार की आवश्यकता को सामने लाता है। अभिभावकों ने दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है और ऐसे घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने हेतु स्कूलों में निगरानी व्यवस्था मजबूत करने की अपील की है।
इस घटना ने शिक्षा व्यवस्था और बच्चों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, खासकर उन बच्चों के लिए जो शारीरिक या मानसिक रूप से कमजोर होते हैं और अपने अधिकारों को लेकर ज्यादा संवेदनशील होते हैं।
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