सरगुजा के सालही ग्राम में राजस्थान विद्युत निगम-आदानी कोल परियोजना का ग्रामीणों ने किया जोरदार विरोध प्रदर्शन : Villagers staged a strong protest against the Rajasthan Electricity Corporation-Adani coal project in Salhi village of Surguja

Uday Diwakar
7 Min Read

Villagers staged a strong protest against the Rajasthan Electricity Corporation-Adani coal project in Salhi village of Surguja: सरगुजा:​​​सरगुजा जिले के उदयपुर विकासखंड के सालही ग्राम में ग्रामीणों ने राजस्थान राज्य विद्युत निगम लिमिटेड को आबंटित तथा अडानी समूह द्वारा संचालित परसा ईस्ट और केते बासेन (PEKB) कोल खनन परियोजना के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। यह विरोध सुबह लगभग 11:30 बजे शुरू हुआ और दोपहर 2 बजे तक चला। प्रदर्शन में सालही, हरिहरपुर, फतेहपुर, घाटबर्रा समेत आसपास के गांवों के सैकड़ों ग्रामीण शामिल हुए।

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि यह परियोजना पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा रही है। कोल ब्लॉक का संचालन अडानी एंटरप्राइजेज के पास है, जबकि इसका स्वामित्व राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) के पास है। ग्रामीणों का कहना है कि कंपनी द्वारा पेड़ों की कटाई और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में ग्राम पंचायतों की अनुमति नहीं ली गई। स्थानीय संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस विरोध का समर्थन किया और इसे “जन-जंगल-जल-जमीन को बचाने की लड़ाई” बताया।

सरगुजा और सूरजपुर जिलों में फैला हसदेव अरण्य क्षेत्र देश के सबसे घने वनों में से एक है, जहां साल और बांस के जंगलों के साथ अनेक वन्यजीव प्रजातियां पाई जाती हैं। 2013 से ही यहां राजस्थान सरकार और अडानी समूह की इस संयुक्त परियोजना का विरोध जारी है। अडानी समूह 2013 से राजस्थान की राज्य कंपनी की ओर से कोयला खनन कर रहा है, जो परसा ईस्ट और केते बासेन ब्लॉक से संचालित है ।

परियोजना में कुल 2,100 एकड़ से अधिक वन भूमि शामिल है, जहां पर पेड़ों की कटाई, भूमि समतलीकरण और विस्थापन जैसे कार्य किए जा रहे हैं । ग्रामीणों का कहना है कि पिछले वर्ष फेस-1 में करीब 8,000 पेड़ों की कटाई हो चुकी है और अब फेस-2 में 11,000 से अधिक पेड़ों को काटने की तैयारी है ।

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गुरुवार को आयोजित विरोध के दौरान ग्रामीणों ने सुबह से ही जंगल क्षेत्रों में डेरा डाल दिया था ताकि पेड़ों की कटाई रोकी जा सके। प्रशासन ने मौके पर भारी पुलिस बल तैनात किया और कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। बताया जा रहा है कि हिरासत में लिए गए ग्रामीणों को बसों में भरकर उदयपुर और लखनपुर थानों में भेजा गया ।

सरकार का कहना है कि यह खनन क्षेत्र राजस्थान के बिजली संयंत्रों की ईंधन आवश्यकता पूरी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राजस्थान राज्य विद्युत निगम के अधीन छाबड़ा, सूरतगढ़ और कालीसिंध थर्मल पॉवर प्लांट्स की बिजली उत्पादन क्षमता इन कोयला ब्लॉकों पर निर्भर करती है ।

ग्रामीणों ने भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। ग्राम सभा के सदस्यों ने बताया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के तहत ग्राम सभा की सहमति लेना अनिवार्य है, लेकिन कंपनी और प्रशासन ने इस प्रक्रिया को नजरअंदाज किया । ग्रामसभा के रजिस्टर में फर्जी रूप से हस्ताक्षर करवाने के आरोप भी सामने आए हैं।

स्थानीय आदिवासी संगठनों का कहना है कि खनन गतिविधियों से न केवल पर्यावरण असंतुलन हो रहा है, बल्कि वन्यजीवों के आवास और जलस्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं। कई गांवों का पुनर्वास अब भी अधूरा है और विस्थापित परिवारों को मुआवजा नहीं मिला है।

हसदेव अरण्य क्षेत्र को छत्तीसगढ़ का ‘फेफड़ा’ कहा जाता है, क्योंकि यह प्रदेश का सबसे बड़ा कार्बन सिंक है। पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी पर असर पड़ेगा, बल्कि क्षेत्र के जल स्रोत भी सूख सकते हैं । यही कारण है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में इस खदान परियोजना को लेकर कई बार याचिकाएं दाखिल की गई हैं ।

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Villagers staged a strong protest against the Rajasthan Electricity Corporation-Adani coal project in Salhi village of Surguja

राजस्थान सरकार का कहना है कि यह परियोजना उनके बिजली संयंत्रों की निरंतर कोयला आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। अडानी समूह का पक्ष है कि सारी प्रक्रियाएं पर्यावरण मंत्रालय से स्वीकृत हैं और वे स्थानीय लोगों के पुनर्वास और मुआवजा प्रावधानों का पालन कर रहे हैं। 2022 में परियोजना विस्तार को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय से वन अनुमति भी मिली थी ।

हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार ने स्थानीय विरोध के चलते कई बार इन परियोजनाओं पर रोक लगाई थी, परंतु हाल के वर्षों में इसे दुबारा शुरू करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी है।

विरोध जारी रहेगा

ग्रामीण नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने परियोजना को वापस नहीं लिया तो वे बड़े स्तर पर आंदोलन करेंगे। “हम अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे, चाहे जितना दमन हो जाए,” सालही के एक ग्रामवासी ने कहा। स्थानीय संगठनों की योजना है कि आने वाले सप्ताह में उदयपुर ब्लॉक मुख्यालय में जन-सम्मेलन आयोजित कर मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार को ज्ञापन सौंपा जाएगा।

सरगुजा की यह ताजा घटना हसदेव अरण्य वन क्षेत्र में जारी कोल खनन विवाद का एक और अध्याय है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह सिर्फ एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि आदिवासी जनजीवन से जुड़ा अस्तित्व का प्रश्न है। वहीं, सरकार और कंपनी का दावा है कि यह विकास और ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति की दिशा में कदम है।
हालांकि दोनों पक्षों के बीच संवाद और विश्वास की कमी के कारण यह संघर्ष लगातार गहराता जा रहा है, और सालही जैसा विरोध यह दर्शाता है कि जंगलों की इस जंग का अंत फिलहाल दूर है।

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