परसा ईस्ट-केते एक्सटेंशन कोयला खदान परियोजना को लेकर टीएस सिंहदेव का बड़ा बयान: “खदान क्षेत्र हसदेव अरण्य की वनभूमि, पर्यावरणीय संरक्षण सर्वोपरि : TS Singhdev’s big Statement on Parsa East-Kate Extension Coal Mine Project

Uday Diwakar
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  • परसा ईस्ट-केते एक्सटेंशन कोयला खदान परियोजना छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में पर्यावरणीय संवेदनशील वनभूमि को प्रभावित कर रही है, जहाँ हजारों पेड़ कटने के साथ-साथ स्थानीय आदिवासी समाज का विस्थापन भी हो रहा है।
  • इस परियोजना के विरोध में स्थानीय लोग और पर्यावरण कार्यकर्ता सक्रिय हैं, उन्होंने खदान से होने वाले पर्यावरणीय और सामाजिक नुकसान को लेकर सरकार से पुनर्विचार और संरक्षण की मांग की है।

TS Singhdev’s big Statement on Parsa East-Kate Extension Coal Mine Project: सरगुजा : परसा ईस्ट-केते एक्सटेंशन कोयला खदान परियोजना छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के हसदेव अरण्य क्षेत्र में स्थित है। यह परियोजना क्षेत्र लगभग 2711 हेक्टेयर में फैला हुआ है, जिसमें से करीब 1898 हेक्टेयर वनभूमि है। इस खदान परियोजना का उद्देश्य कोयला खनन के माध्यम से ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देना है। परियोजना को पर्यावरण मंत्रालय से 2019 में फारेस्ट क्लीयरेंस मिली थी, जिसके बाद इसमें पेड़ों की कटाई शुरू हुई।

छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ कांग्रेस नेता टीएस सिंहदेव ने परसा ईस्ट-केते एक्सटेंशन कोयला खदान परियोजना को लेकर एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा कि इस खदान का लगभग पूरा क्षेत्र वनभूमि है और इसमें राजस्व या कृषकों की भूमि बहुत कम है। यह क्षेत्र हसदेव अरण्य क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जिसे पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यहाँ घने जंगल, विविध प्रकार के वन्यजीव और प्राकृतिक जल संरक्षण की व्यवस्था है, जिसका फायदा आसपास के जिलों को मिलता है।

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TS Singhdev’s big Statement on Parsa East-Kate Extension Coal Mine Project

परसा ईस्ट-केते बासन कोयला खदान में पेड़ों की कटाई से स्थानीय आदिवासी समाज और पर्यावरण संरक्षण के लिए चिंताएं जन्मीं। इस क्षेत्र में सैकड़ों हेक्टेयर घने जंगल हैं, जहां अनेक वन्यजीव और जैव विविधता पाई जाती है। स्थानीय लोग और पर्यावरण प्रेमी इस खदान परियोजना का कड़ा विरोध कर रहे हैं क्योंकि यह क्षेत्र हसदेव अरण्य के अंतर्गत आता है, जो मध्य भारत का सबसे बड़ा अखण्डित वन क्षेत्र माना जाता है।

परिस्थितिकी दृष्टि से यह क्षेत्र बहुत संवेदनशील है क्योंकि यहाँ प्राकृतिक जल संरक्षण की प्रणाली है और यह विभिन्न जल स्रोतों का आधार भी है। खनन कार्यों के कारण जल निकासी, जमीन की स्थिरता और वन्यजीवों के आवास प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा, खनन से हाथी जैसे बड़े स्तनधारियों के आवागमन में बाधा आती है, जो मानव–पशु संघर्ष को बढ़ा सकता है।

राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड को परसा कोल बॉक का संचालन सौंपा गया है, जबकि खनन का ठेका अडानी इंटरप्राइजेज के पास है। इस परियोजना से सरकार को ऊर्जा उत्पादन में वृद्धि के साथ आर्थिक लाभ की उम्मीद है, लेकिन साथ ही पर्यावरण, वन्यजीव एवं सामाजिक प्रभावों के कारण भारी विवाद भी है।

सरकार ने परियोजना के पक्ष में विकास और रोजगार के मुद्दों को उठाया है, वहीं विपक्षी एवं पर्यावरण कार्यकर्ता प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और आदिवासी अधिकारों पर ज़ोर देते हैं। सुप्रीम कोर्ट में भी इस खदान परियोजना से जुड़े कई याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें पर्यावरण सुरक्षा और विस्थापन की संवेदनशीलता को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

पर्यावरणीय मंजूरी के तहत परियोजना के लिए कई शर्तें रखी गई हैं, जिनमें वन क्षेत्र की पुनर्स्थापना, जल संरक्षण की योजना, और सामाजिक पुनर्वास कार्यक्रम शामिल हैं। लेकिन स्थानीय लोगों व संगठनों का मानना है कि ये उपाय पर्याप्त नहीं हैं और वास्तविकता में खदान के कारण पर्यावरणीय और सामाजिक क्षति होगी।

हालांकि परियोजना प्रशासन और सरकार के लिए ऊर्जा उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसकी पर्यावरणीय और सामाजिक लागत पर व्यापक विचार आवश्यक है। पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता और लोकहित के बीच उचित संतुलन कायम रखना चुनौतीपूर्ण है।

परसा ईस्ट-केते एक्सटेंशन कोयला खदान परियोजना भारत के ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, परन्तु इसका क्रियान्वयन प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा के बिना संभव नहीं है। इसलिए, इस परियोजना के सामाजिक-पर्यावरणीय प्रभावों पर गंभीरता से गौर करने और स्थानीय समुदायों की चिंता को समझते हुए निर्णय लेने की जरूरत है ताकि सतत विकास सुनिश्चित किया जा सके।

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