राज्योत्सव में फीकी रही रोशनी: अंबिकापुर कार्यक्रम में खाली कुर्सियाँ और लौट गए मंत्री : The state festival was dim empty chairs and ministers left the Ambikapur event

Uday Diwakar
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The state festival was dim empty chairs and ministers left the Ambikapur event: सरगुजा:अंबिकापुर के कला केंद्र मैदान में आयोजित छत्तीसगढ़ राज्योत्सव 2025 इस बार प्रशासन और भाजपा संगठन के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। राज्य निर्माण के 25वें साल के जश्न में जहाँ प्रदेशभर के विभिन्न जिलों में उल्लास और धूमधाम रही, वहीं अंबिकापुर का यह आयोजन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया। खाली पड़ी कुर्सियाँ और कम उत्साही माहौल ने आयोजकों सहित आम नागरिकों को भी निराश कर दिया।​

छत्तीसगढ़ राज्योत्सव की शुरुआत प्रदेश के गौरव, संस्कृति और उपलब्धियों के सार्वजनिक प्रदर्शन के उद्देश्य से एक बड़े मंच के रूप में हुई थी। हर साल इस अवसर पर समुदाय के विभिन्न हिस्से जुटते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रम, विकास प्रदर्शनियां और सामान्य सभा का आयोजन होता है। अंबिकापुर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में प्रशासन की ओर से लोगों को आकर्षित करने के लिए व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ, बड़े-बड़े बैनर, सोशल मीडिया अभियान, वॉल पेंटिंग और ऑडियो-वीडियो प्रचार का सहारा लिया गया।

कार्यक्रम के लिए विस्तृत तैयारियाँ की गईं थीं। कला केंद्र मैदान को रोशनी से सजाया गया, स्टेज के चारों ओर भव्य सजावट की गई। विभिन्न स्टॉल, प्रदर्शनी, खाद्य मेले और स्थानीय हस्तशिल्प के बूथ लगाए गए थे। आमंत्रित अतिथियों की सूची में स्थानीय नेता, प्रशासनिक अधिकारी, सांस्कृतिक दल और प्रदेश सरकार के मंत्री शामिल थे। कार्यक्रम को खास बनाने के लिए छत्तीसगढ़ी नृत्य दलों, लोकगीत गायकों और नाट्य प्रस्तुतियों को स्थान दिया गया।

भीड़ जुटाने में नाकामी

भव्यता की तमाम तैयारियों के बावजूद, आयोजन स्थल पर जनता की भागीदारी उम्मीद से बेहद कम रही। कार्यक्रम के आरंभ से ही सैकड़ों कुर्सियाँ खाली पड़ी रहीं। आयोजकों ने भीड़ जुटाने के लिए कई प्रयास किए, मगर स्थानीय लोगों में उत्साह की कमी स्पष्ट रूप से नजर आई। सोशल मीडिया पर भी इस विषय पर काफी चर्चा रही — लोग आयोजन के समय, सामग्री या प्रचार रणनीति को लेकर असंतोष व्यक्त करते दिखे।

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मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ शासन के कृषि मंत्री रामविचार नेताम समारोह में शिरकत करने पहुँचे। मंत्री अपने भाषण के दौरान बार-बार कुर्सियों की खाली कतारों को देखकर असहज हुए और निर्धारित कार्यक्रम से पहले ही जल्द वापस लौट गए। इससे सरकारी अमले में हलचल मच गई और व्यवस्थापक परेशान दिखे। आयोजन समिति ने स्थिति सँभालने का कई बार संयोजन किया, मगर भीड़ जुटाना संभव नहीं हो सका।

सोशल मीडिया पर आयोजन को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। कई स्थानीय पत्रकारों और विपक्षी नेताओं ने प्रशासनिक असफलता पर सवाल उठाए और राज्य सरकार की आयोजन नीति की आलोचना की। लोगों ने यह भी लिखा कि बड़े आयोजनों में स्थानीय युवाओं, महिलाओं और बच्चों को विशेष रूप से प्रेरित करना और उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है, वरना जन अभियान व्यर्थ साबित हो सकते हैं।

कार्यक्रम में शामिल कई नृत्य और गायन प्रस्तुतियाँ दर्शकों की उपस्थिति न मिलने से खाली मंच पर ही संपन्न करनी पड़ीं। लोककलाकारों को भी उम्मीद थी कि इस बार आमजन के साथ संवाद होगा, लेकिन मैदान का बड़ा हिस्सा खाली रहा। कुछ अधिकारी, पत्रकार और आयोजन समिति के सदस्य ही तालियाँ बजाते नजर आए। इसके परिणामस्वरूप कलाकारों में भी निराशा रही कि उनके प्रयासों को समुचित सराहना नहीं मिल पाई।

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समारोह के जल्दी समापन के बाद आयोजकों के बीच मंथन शुरू हुआ कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? कुछ लोगों ने प्रशासनिक स्तर पर कमी व स्थानीय संगठनों से समन्वय न बनने को इस असफलता का कारण बताया। विपक्षी दलों ने इसे सरकार के प्रति जनता की नाराजगी का संकेत बताया। वहीं प्रशासन ने अगले आयोजन के लिए जनसंपर्क, प्रचार रणनीति और आयोजन पद्धति में बदलाव लाने की बात कही ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने।

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The state festival was dim empty chairs and ministers left the Ambikapur event

इस आयोजन की तुलना रायपुर और अन्य जिलों में सम्पन्न हुए राज्योत्सव से करें, तो वहाँ काफी भीड़ और उत्साह देखने को मिला। रायपुर में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ-साथ राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक उपलब्धियों का प्रदर्शन सफल रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रायपुर में राज्योत्सव का उद्घाटन कर छत्तीसगढ़ को 14,300 करोड़ की सौगात दी. ऐसे में अंबिकापुर की खाली कुर्सियाँ आयोजन के आयोजनकर्ताओं के लिए सवालिया निशान बन गईं।

यह आयोजन प्रशासन और संगठनात्मक तत्परता की परीक्षा था। जन सहभागिता के बिना, कोई भी भव्य आयोजन केवल औपचारिकता बन कर रह जाता है। प्रशासन और भाजपा संगठन को आगे के आयोजनों के लिए जन आकांक्षा, स्थानीय मुद्दे, युवाओं की भागीदारी और प्रचार के नए रूपों पर ध्यान देना होगा, तभी राज्योत्सव जैसे सार्वजनिक उत्सव सही मायनों में सफल और लोकप्रिय बन सकते हैं।

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