बीजापुर में नक्सली IED विस्फोट से नाबालिग गंभीर घायल : Minor seriously injured in Naxalite IED blast in Bijapur

Uday Diwakar
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Minor seriously injured in Naxalite IED blast in Bijapur: छत्तीसगढ़-बीजापुर :बीजापुर जिले के गंगालूर थाना क्षेत्र के पीडिया गांव में नक्सलियों द्वारा बिछाए गए IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) की चपेट में आकर एक नाबालिग आदिवासी बच्चा गंभीर रूप से घायल हो गया। शुक्रवार सुबह घटी इस घटना ने न केवल उस मासूम के जीवन को झकझोर दिया, बल्कि पूरे इलाके में दहशत और आक्रोश का वातावरण उत्पन्न कर दिया है। यह हादसा बताता है कि किस तरह से छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र आज भी निर्दोष नागरिकों के लिए अभिशाप बने हुए हैं।​

शुक्रवार सुबह लगभग 8 बजे पीडिया गांव में जब रोजमर्रा की जिंदगी सामान्य गति से चल रही थी, तभी अचानक एक जोरदार विस्फोट ने पूरे गांव की शांति भंग कर दी। पड़ताल में सामने आया कि नक्सलियों ने जंगल के रास्ते में एक IED बम छुपा रखा था, जिसका निशाना मूलतः सुरक्षाबल थे, लेकिन दुर्भाग्यवश इस बार एक मासूम बालक इसकी चपेट में आ गया। वह बच्चा अपने घर के बाहर खेल रहा था और मानो उसकी मासूमियत नक्सल हिंसा की उस बर्बर मानसिकता के आगे हार गई।​

जैसे ही धमाका हुआ, आसपास के लोग डर और घबराहट के साथ मौके की ओर दौड़े। मासूम बच्चा खून से लथपथ, बेहोश पड़ा था। ग्रामीणों ने तत्काल बचाव कार्य शुरू किया और पुलिस को सूचना दी। सीआरपीएफ 199वीं और 85वीं बटालियन की टीम मौके पर पहुंची और बच्चे को प्राथमिक उपचार देकर, तत्काल जिला अस्पताल बीजापुर भेजा गया। डाक्टरों ने बताया कि बच्चे का एक पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ है और उसे गंभीर चोटें आई हैं, उसके प्राण बचाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं।​

घटना की सूचना मिलते ही बच्चे के परिजन अस्पताल पहुंचे। मां-बाप अपने घायल बेटे को देखकर रो पड़े। “हमारा क्या कसूर है, क्यों हर बार हमारे ही बच्चे इन बमों की भेंट चढ़ते हैं?”, मां बार-बार यही सवाल पूछ रही थी। गांव के अन्य लोग भी इस सदी के सबसे बर्बर हिंसा, नक्सलवाद, के खिलाफ आक्रोशित दिखे। कई लोगो का कहना था कि सरकार और प्रशासन के तमाम वादों के बावजूद, आज भी जंगल के बच्चे घर से निकलते समय यह नहीं जानते कि वे सही-सलामत लौटेंगे या नहीं।​

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नक्सली लंबे समय से छत्तीसगढ़ के इन इलाकों में अपनी धाक जमाने के लिए IED जैसी घातक रणनीति अपनाते आ रहे हैं। वे जंगल, रास्तों, गांव के करीब और खेतों में ऐसे प्रेशर बम लगाते हैं जिसका इरादा सुरक्षाबलों को नुकसान पहुंचाना होता, लेकिन वास्तविकता में अक्सर इन बमों की चपेट में आम ग्रामीण, महिलाएं और बच्चे ही आ जाते हैं। पिछले दो वर्षों में बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा जैसे जिलों में दर्जनों मामले सामने आए हैं, जहां ग्रामीण, मवेशी चराने वाले, लकड़ी बीनने वाले या खेत में काम करते हुए लोग IED ब्लास्ट के शिकार हुए हैं। ऐसी घटनाओं ने ग्रामीण आबादी के मानस में स्थायी डर भर दिया है। बच्चे स्कूल जाने में डरते हैं, किसान खेत जाने से हिचकते हैं, और महिलाएं जंगल में लकड़ी या फल-सब्जी लेने से भी कतराने लगी हैं।​

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Minor seriously injured in Naxalite IED blast in Bijapur

प्रशासन के पास ऐसे हादसों से निपटने के लिए सीमित उपाय हैं। आईईडी का पता लगाने के लिए पुलिस और सीआरपीएफ की एक्सपर्ट टीम्स यानी बम निरोधक दस्ते लगातार अभियान चलाते हैं, पर पूरे बीजापुर जैसे जनसंख्या-विहीन, वन-प्रचुर इलाकों में हर बम को समय रहते ढूंढ़ पाना लगभग असंभव सा है। सुरक्षा बल अपने अभियान तेज़ रखने की बात कहते हैं, लेकिन संसाधन और लोकल सपोर्ट की कमी से चुनौतियां जस-की-तस बनी रहती हैं।​

राज्य व केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए कई योजनाएं घोषित की हैं—सड़क निर्माण, स्वास्थ्य, शिक्षा, पक्का मकान, राशन, रोजगार और पुलिस आउटपोस्ट—but ground reality कुछ और ही तस्वीर पेश करता है। सड़कें बन भी जाती हैं तो नक्सली जल्द ही उन पर बम लगा देते हैं, स्कूल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अक्सर बंद रहते हैं, ग्राम पंचायत के भवन जला दिए जाते हैं या खाली पड़े रहते हैं।​

शासन-प्रशासन का दावा है कि एक ओर सुरक्षा बल लगातार अभियान चलाकर नक्सलियों के नेटवर्क को तोड़ने में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर ‘विकास’ के जरिए स्थानीय युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है, हाल ही में अनेक नक्सलियों का आत्मसमर्पण भी हुआ है। मगर क्षेत्र की असलता में अभी भी भय, असुरक्षा और जीवन के प्रति अन्धकार ज्यादा उपस्थित दिखता है।​

पिछले पांच वर्षों में बीजापुर जिले में करीब 40 से ज़्यादा आम नागरिक IED विस्फोटों का शिकार हुए हैं, जिनमें अधिकांश बच्चे और महिलाएं थी. अकेले 2025 के जनवरी से अक्टूबर तक कम-से-कम 7 ग्रामीण IED धमाकों की चपेट में आकर जान गंवा चुके हैं और दर्जनों घायल हैं।​

ऐसी घटनाएं सिर्फ किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की दुखद याद बन जाती हैं। लोग एक-दूसरे के भय, गुस्से और असहायता में साझेदार बन जाते हैं। ग्रामीणों की मांग है कि सरकार जंगलों में अधिक सघन सर्च अभियान चलाए; हर गांव के पास सुरक्षाबलों की तैनाती हो; बच्चों, महिलाओं, एवं किसानों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए; और घायलों व मृतकों के परिवार को आर्थिक सहायता दी जाए।​

स्थानीय मीडिया और स्वयंसेवी संगठन लगातार ऐसे मुद्दों को उठाकर प्रशासन का ध्यान खींचने की कोशिश करते रहते हैं। कई बार मीडिया रिपोर्ट्स के बाद ही बच्चों के इलाज की सरकारी जिम्मेदारी तय होती है, अपंगता बीमा और राहत राशि मिलती है। इसके बावजूद, सबसे बड़ी जिम्मेदारी अब समाज, सरकार और पुलिस पर है कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो—उसके प्रति एक ठोस रोडमैप तैयार किया जाए।​

सिर्फ मुआवजा, मुफ्त इलाज, और संवेदना व्यक्त करना पर्याप्त नहीं; आम आदमी की भलाई और सुधार तब मुमकिन है जब समूची नक्सल नीति और ग्राम विकास पर पुनर्विचार हो। जंगल के आखिरी गांव के बच्चे की सुरक्षा तब ही संभव है जब राज्य, समाज, और सुरक्षा बल मिलकर एकजुट रणनीति बनाएं।

बीजापुर में हुए इस ताजा हादसे ने एकसार बार फिर दिखाया है कि नक्सलवाद की चपेट में किस कदर मासूम जन-जीवन त्रस्त है। एक ओर जहां मासूमों का खून बह रहा है, वहीं दूसरी ओर आदिवासी समुदाय अपनी आस्था, स्वतंत्रता और रोजमर्रा के स्वाभिमान की लड़ाई लड़ने को बाध्य है। प्रशासन और नीति-निर्माताओं के लिए इस घटना को चेतावनी समझनी चाहिए—जब तक ज़मीन स्तर पर सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और संवाद का ताना-बाना मजबूत नहीं होगा, तब तक बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा के मासूम ऐसे ही घातक हिंसा के शिकार बनते रहेंगे।​​

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