Major land allocation scam in Balrampur: बलरामपुर:बलरामपुर जिले में शासकीय भूमि के दुरुपयोग और कथित मिलीभगत का सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोप है कि ग्राम पंचायत कोदेड़ा, कोटडीह, भेंडरी, परसवार खुर्द, करमडिहा और पकराडीह में स्थित लगभग 60 से 70 एकड़ शासकीय एवं भू-स्वामी भूमि को राजस्व अमले ने कागज़ों में एक ही परिवार के नाम दर्ज कर दिया। पूरे प्रकरण ने न केवल प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि ग्रामीणों के बीच भी आक्रोश और अविश्वास का माहौल पैदा कर दिया है।
एक ही परिवार के नाम 26 खसरा नंबर
सूत्रों के अनुसार, संबंधित गांवों में कुल करीब 26 खसरा नंबरों की भूमि, जो रिकॉर्ड में शासकीय या भू-स्वामी भूमि के रूप में दर्ज थी, उसे तहसील स्तर से लेकर पटवारी स्तर तक की प्रक्रिया के माध्यम से एक ही परिवार के सदस्यों के नाम चढ़ा दिया गया। कथित रूप से यह पूरा खेल कुछ ही वर्षों में नहीं, बल्कि सुनियोजित तरीके से चरणबद्ध रूप में किया गया, ताकि किसी को तत्काल संदेह न हो।
आरोप है कि मुख्य रूप से परिवार के मुखिया के रूप में विरेंद्र गुप्ता के नाम पर सबसे अधिक भूमि दर्ज की गई, जबकि उनके भाई नरेंद्र गुप्ता, धर्मेंद्र गुप्ता, पिता विजय गुप्ता, माता सरिता देवी तथा अन्य परिजनों के नाम पर भी अलग-अलग खसरा नंबरों की जमीन चढ़ाई गई। सिर्फ सात साल की अवधि में अधिकांश शासकीय भूमि इस परिवार के नाम दर्ज हो चुकी थी, जबकि परिवार के सदस्य ग्राम कोदेड़ा में स्थायी रूप से निवास भी नहीं करते थे।
मामले की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि जिन खसरा नंबरों पर कागज़ों में नामांतरण किया गया, उन पर वास्तव में इस परिवार का कब्जा तक नहीं है। संबंधित भूमि पर या तो खेती पूर्ववर्तियों द्वारा की जा रही है या गांव के अन्य पारंपरिक भू-स्वामियों का उपयोग जारी है। इससे यह संकेत मिलता है कि पूरा खेल केवल रिकॉर्ड में हेरफेर कर भविष्य में बड़े स्तर पर बिक्री, लीज या अन्य वाणिज्यिक लाभ लेने के इरादे से रचा गया था।
स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि न तो गांव की किसी बैठक में इस तरह के बंटवारे की जानकारी दी गई और न ही राजस्व निरीक्षण के दौरान कभी बताया गया कि भूमि किसी निजी व्यक्ति के नाम की जा चुकी है। कई किसानों को जब खसरा नकल निकलवाने की ज़रूरत पड़ी, तभी अचानक उन्हें पता चला कि जिस ज़मीन पर वे पीढ़ियों से खेती कर रहे हैं, कागज़ों में वह किसी और के नाम दर्ज दिखाई दे रही है।
पूरा मामला सामने आने के बाद राजस्व तंत्र की भूमिका कटघरे में आ गई है। सामान्यतः किसी भी शासकीय या भू-स्वामी भूमि को निजी खाते में दर्ज करने के लिए लंबी प्रक्रिया, आपत्तियों की सुनवाई और उच्च स्तर की अनुमति अनिवार्य होती है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि कैसे एक के बाद एक आदेश पारित होते गए और किसी अधिकारी ने आपत्ति नहीं की।
जानकारों का मानना है कि बिना पटवारी, राजस्व निरीक्षक, नायब तहसीलदार और तहसीलदार की मिलीभगत के इस तरह का ‘रिकॉर्ड हेरफेर’ संभव ही नहीं है। आशंका जताई जा रही है कि पुराने वर्षों की बही-खातों में कटिंग-ओवरराइटिंग, फर्ज़ी खतौनी और फर्जी वरासत आदेशों के ज़रिए धीरे-धीरे जमीन को निजी खाते में स्थानांतरित किया गया। यदि व्यापक जांच की जाए तो सिर्फ इन 26 खसरा नंबरों से कहीं अधिक भूमि के मामले उजागर हो सकते हैं।
जैसे-जैसे मामला सार्वजनिक हुआ, ग्राम पंचायत कोदेड़ा और आस-पास के गांवों में गहमागहमी तेज हो गई। कई ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि उन्हें न तो किसी प्रकार का नोटिस मिला और न ही आपत्ति दर्ज कराने का अवसर दिया गया। कुछ पंच-सरपंचों का कहना है कि राजस्व कर्मचारियों ने पंचायत प्रतिनिधियों को भी विश्वास में नहीं लिया।
ग्रामीण संगठनों ने इसे ‘शासकीय भूमि की लूट’ करार देते हुए तत्काल निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस तरह के मामलों पर अंकुश नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में गरीब किसानों और भूविहीन परिवारों के लिए भूमि सुरक्षित रखना मुश्किल हो जाएगा। कई लोगों ने इस प्रकरण को राज्य स्तर के लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो तक ले जाने की तैयारी शुरू कर दी है।
Major land allocation scam in Balrampur
शासकीय भूमि अक्सर स्कूल, अस्पताल, सड़क, सामुदायिक भवन, खेल मैदान, गौठान या अन्य सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित रहती है। जब इस तरह की भूमि किसी एक प्रभावशाली परिवार के नाम दर्ज हो जाती है, तो विकास योजनाओं के लिए जमीन का अभाव पैदा हो जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि उनके क्षेत्र में पहले ही शासकीय भूमि सीमित बची है, ऐसे में दर्जनों एकड़ जमीन एक ही परिवार के नाम कर देना आने वाले समय में बड़ी बाधा साबित होगा।
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