Mainpat: “No compensation, no mining”: सरगुजा:अंबिकापुर।छत्तीसगढ़ के शिमला कहे जाने वाले मैनपाट इलाके में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और स्थानीय निवासियों के अधिकारों के बीच बड़ा टकराव सामने आ गया है। मैनपाट के बरिमा गांव में माझी जनजाति के ग्रामीणों ने अपनी निजी कृषि भूमि पर बिना मुआवजे के बाक्साइट खनन करने वाली निजी कंपनी के काम को पूरी तरह रोक दिया है। लगभग 52 किसानों की 300 एकड़ जमीन पर छत्तीसगढ़ मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (सीएमडीसी) और मां कुदरगढ़ी एल्यूमिना कंपनी के माध्यम से खनन चल रहा था, जिसकी लीज 2023 में समाप्त हो चुकी है।
ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन और कंपनी उनकी जमीनों का उपयोग तो कर रही हैं, लेकिन बदले में मिलने वाली उचित आर्थिक सहायता या मुआवजे की कोई प्रक्रिया शुरू नहीं की गई। जिला पंचायत सदस्य रतनी नाग ने बताया कि बरिमा ग्राम पंचायत क्षेत्र में भारी मशीनें लगाकर खेतों में खुदाई की जा रही थी, जबकि किसानों को एक पैसा भी नहीं दिया गया। शुक्रवार को आक्रोशित ग्रामीण खदान स्थल पर पहुंचे और काम ठप करा दिया। “जब तक मुआवजा नहीं, तब तक खनन नहीं” के नारों से हवा गूंज उठी।
मैनपाट क्षेत्र, जो अपनी ठंडी वादियों, घने जंगलों और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है, अब खनन के खतरे से जूझ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि बाक्साइट खनन से पहाड़ियों का कटाव होगा, भूजल स्तर गिर जाएगा और जलस्रोत सूख जाएंगे। कंडराजा, नर्मदापुर, बहिसा, उरगा, चोरकीपानी और पेठ जैसे आसपास के गांवों में भी विरोध की लहर फैल गई है। एक बुजुर्ग ग्रामीण ने कहा, “ये जमीन-पहाड़ हमारी पहचान हैं। खनन कंपनियों के लिए हम अपनी जिंदगी दांव पर नहीं लगाएंगे। धूल, ट्रकों की आवाजाही और विस्थापन से हमारी खेती-बाड़ी चौपट हो जाएगी।”
स्थानीय माझी जनजाति के किसान बताते हैं कि खनन से मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ेगा, सड़क हादसे होंगे और स्थानीय रोजगार असुरक्षित हो जाएगा। प्रस्तावित परियोजना में सालाना 80,700 टन बाक्साइट उत्खनन की योजना है, जो 135 हेक्टेयर क्षेत्र को प्रभावित करेगी। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि मशीनें नहीं हटाई गईं तो कानून-व्यवस्था बिगड़ सकती है, जिसकी जिम्मेदारी कंपनी और सीएमडीसी की होगी। विरोध के बाद कंपनी को मशीनें हटानी पड़ीं, लेकिन ग्रामीण सतर्क हैं।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन पर भी आरोप लगाया है। उनका कहना है कि पर्यावरण संरक्षण मंडल द्वारा 30 नवंबर को नर्मदापुर स्टेडियम में आयोजित लोकसुनवाई में उनकी आवाज दबाई गई। हाल ही में कलेक्टर अजीत वसंत को ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें जांच का आश्वासन मिला, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। ग्रामीण पंचायतों में बैठकें कर रहे हैं और ग्राम सभाओं से वास्तविक सहमति की मांग कर रहे हैं। विभिन्न संगठनों ने भी समर्थन का ऐलान किया है।
सीएमडीसी को 2023 तक लीज मिली थी, जो समाप्त हो चुकी है। इसके बावजूद मां कुदरगढ़ी स्टील्स प्रा. लि. द्वारा सप्लीमेंट्री एग्रीमेंट पर दबाव बनाया जा रहा है। ग्रामीणों का स्पष्ट संदेश है कि स्थानीय समुदाय की सहमति के बिना कोई खनन नहीं चलेगा। जिला प्रशासन ने अभी तक कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन तनाव बढ़ रहा है।
मैनपाट को ‘छत्तीसगढ़ का शिमला’ कहा जाता है, जहां तिब्बती प्रवासियों की बड़ी आबादी है और पर्यटन केंद्र विकसित हो रहा है। यहां के जंगल, पहाड़ और जलवायु स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार हैं। पिछले साल नवंबर से ही बाक्साइट खनन का विरोध चल रहा है, जिसमें ग्रामीणों ने लोकसुनवाई को लेकर आक्रोश जताया था। जनवरी 2026 में यह संघर्ष चरम पर पहुंचा, जब किसानों ने सीधे खदान पर उतर आए। विशेषज्ञों का कहना है कि बाक्साइट जैसे खनिजों का दोहन विकास का नाम देकर पर्यावरणीय तबाही ला सकता है।
Mainpat: “No compensation, no mining”
सरगुजा जिले में खनन गतिविधियां बढ़ रही हैं, लेकिन स्थानीय अधिकारों की अनदेखी से विवाद उभर रहे हैं। ग्रामीण नेता बोले, “हम विकास के खिलाफ नहीं, लेकिन लूट के खिलाफ हैं। मुआवजा, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण सुनिश्चित हो तो बात अलग है।” फिलहाल खनन ठप है, लेकिन ग्रामीण सड़क पर डटे हैं। प्रशासन को अब तत्काल हस्तक्षेप करना होगा, वरना आंदोलन और बड़ा हो सकता है।
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