Land acquisition dispute in Amra Lakhnapur: सरगुजा : अंबिकापुर के लखनपुर क्षेत्र के अमेरा गांव में कोयला खदान के विस्तार के लिए जमीन अधिग्रहण विवाद एक लंबे समय से तनावपूर्ण स्थिति में है। ग्रामीण पिछले पंद्रह दिनों से अपने खेतों में तंबू लगाकर धरने पर बैठे हैं और अपनी जमीन की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्पित हैं। उनका कहना है कि वे किसी भी सूरत में अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे।
Land acquisition dispute in Amra Lakhnapur
इस विवाद की पृष्ठभूमि में जैसे-जैसे खदान का विस्तार प्रक्रिया आगे बढ़ी, वैसे-वैसे जमीन अधिग्रहण को लेकर स्थानीय लोगों और प्रशासन के बीच मतभेद बढ़ते गए। ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी सहमति और मुआवजे के बिना उनकी जमीन जबरन अधिग्रहित करने का प्रयास किया जा रहा है। इसलिए वे अपने खेतों में तंबू लगाकर लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं और अपनी जमीन के स्वामित्व का अधिकार बनाए रखने की मांग कर रहे हैं।
ग्रामीणों के प्रदर्शन में महिलाएं, बुजुर्ग, युवा सभी शामिल हैं। वे दिन-रात धरना देकर खदान के विस्तार को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि खदान के विस्तार से न केवल उनकी खेती प्रभावित होगी, बल्कि उनकी आजीविका भी खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए वे प्रशासन से मांग करते हैं कि बिना उनकी सहमति और उचित मुआवजा दिए बिना कोई भी जमीन ना ली जाए।
भारतीय कानून, खासकर RFCTLARR अधिनियम 2013 के मुताबिक, किसी भी जमीन के अधिग्रहण में प्रभावित लोगों की सहमति, सामाजिक प्रभाव मूल्यांकन और उचित मुआवजा जरूरी होता है। ग्रामीणों का मानना है कि इन प्रक्रिया का सही से पालन नहीं किया जा रहा है। इसके कारण उनमें असंतोष और आक्रोश बढ़ा है।
प्रशासन ने कुछ प्रभावित परिवारों को नौकरी, मुआवजा और पुनर्वास के उपाय करने का आश्वासन दिया है। लेकिन व्यापक स्तर पर यह आश्वासन सभी के लिए पर्याप्त नहीं माना जा रहा। स्थानीय लोगों को भरोसा नहीं है कि उन्हें बेहतर सुविधाएं और मुआवजा मिलेगा। इसलिए वे अपनी जमीन बचाने के लिए आंदोलन पर कायम हैं।
धरना स्थल पर लगाए गए नारे और ग्रामीणों के संदेश इस बात को स्पष्ट करते हैं कि वे अपनी जमीन के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। नारे जैसे “हमारी जमीन, हमारा अधिकार,” और “कोयला खदान नहीं, हमारी भूमि चाहिए,” उनके संघर्ष की गहराई को दर्शाते हैं।
यह भूमि अधिग्रहण विवाद न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक स्तर पर भी गंभीर प्रभाव डाल रहा है। स्थायी रूप से कृषि काम प्रभावित होने की चिंता के साथ-साथ ग्रामीणों को अपनी सांस्कृतिक और पारंपरिक जमीन खोने का भय सताता है। इसके साथ ही उनकी रोजी-रोटी का साधन भी संकट में पड़ सकता है।
अमेरा खदान के विस्तार के संबंध में यह विवाद प्रशासन के लिए एक चुनौती बन चुका है। स्थानीय ग्रामीणों की सहमति के बिना समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं दिखता। इसलिए आवश्यक है कि प्रशासन और कंपनी स्थानीय लोगों से संवाद बढ़ाएं, उचित मुआवजा और पुनर्वास के साथ-साथ उनकी मांगों को गंभीरता से लें। तभी इस विवाद को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सकेगा।
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