टपकती छत, प्लास्टिक का सहारा: संकट में जोका पाठ छात्रावास, 50 से अधिक आदिवासी बच्चे संकट में : Joka Patha Hostel in Trouble 50 Tribal Children in Distress

Uday Diwakar
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Joka Patha Hostel in Trouble 50 Tribal Children in Distress: बलरामपुर: शंकरगढ़। जिले के शंकरगढ़ विकासखंड में जोका पाठ छात्रावास की स्थिति बहुत ही खराब है। यहां रहने वाले 50 से अधिक आदिवासी बच्चे जर्जर और टूटी-फूटी बिल्डिंग में जीवन यापन करने को मजबूर हैं। यह छात्रावास बारिश से बचाने के लिए प्लास्टिक की चादर से ढका हुआ है, जिससे पता चलता है कि स्थिति कितनी गंभीर है। बारिश के मौसम में छात्रावास की छत से लगातार पानी टपकता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई और रहने का माहौल बहुत खराब हो जाता है।

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Joka Patha Hostel in Trouble 50 Tribal Children in Distress

छात्रावास के अधीक्षक ने बताया कि उन्होंने कई बार अधिकारियों को इस समस्या की जानकारी दी है, लेकिन अभी तक कोई सुधार नहीं हुआ है। छात्रावास की दीवारें धुआं और नमी से भरी हुई हैं और जगह-जगह दरारें पड़ गई हैं। यह भवन बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं रह गया है और कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है।

इस छात्रावास में 50 से ज्यादा बच्चे रहते हैं

इस छात्रावास में 50 से ज्यादा बच्चे रहते हैं लेकिन यहां केवल 30 बिस्तर उपलब्ध हैं। इस कारण कई बच्चे एक बिस्तर पर दो-तीन बच्चे मिलकर सोते हैं। इससे उनकी नींद और सेहत दोनों प्रभावित होती हैं। साफ-सफाई और मरम्मत का अभाव भी बच्चों की जिंदगी को और कठिन बना देता है।

जोका पाठ छात्रावास मुख्य रूप से दूर-दराज के आदिवासी बच्चों के लिए बनवाया गया था ताकि वे अपने गांव से दूर आकर यहां पढ़ाई कर सकें और अपने भविष्य को बेहतर बना सकें। पर आज यह छात्रावास बच्चों के लिए खतरे का कारण बन गया है। बच्चों के परिजन और आसपास के लोग इसे लेकर बहुत चिंतित हैं और स्थानीय अधिकारियों से इस समस्या का समाधान करने की मांग कर रहे हैं।

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ग्रामीणों का कहना है कि कई बार उन्होंने इस छात्रावास की स्थिति के बारे में अधिकारियों को बताया, लेकिन कोई भी कदम नहीं उठाया गया। पिछले साल भी यही परेशानी थी और अब भी बिल्डिंग की हालत बदतर हो गई है। स्थानीय शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता भी प्रशासन से आग्रह कर रहे हैं कि जल्द से जल्द इस बिल्डिंग की मरम्मत या नया छात्रावास बनाया जाए।

छात्रावास के अधीक्षक के अनुसार, “बारिश के दिनों में हमारी छत से पानी टपकता रहता है, और हमें पूरे छात्रावास को प्लास्टिक की चादर से ढकना पड़ता है। यह बच्चों के रहने और पढ़ाई के लिए बहुत मुश्किल बनता है।” उन्होंने बताया कि बिल्डिंग की हालत बहुत खराब है और उसे तुरंत ठीक करने की जरूरत है।

एक शिक्षक ने बताया कि बारिश की वजह से बच्चों का ध्यान पढ़ाई से हट जाता है। लगातार पानी टपकने से स्कूल का माहौल खराब हो जाता है और इससे बच्चों की सेहत पर भी बुरा असर पड़ता है। बच्चों को सर्दी, खांसी जैसी बीमारियां हो रही हैं जो इस खराब हालत के कारण और बढ़ रही हैं।

आदिवासी आयोग और कुछ सामाजिक संस्थाएं भी इस ओर ध्यान दे रही हैं, लेकिन अभी तक इस मामले में सही दिशा में कोई काम नहीं हुआ है। सरकार ने वादा किया था कि वे छात्रावासों में बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे, पर यह छात्रावास अभी तक उस वादे से काफी दूर है।

स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। कोई भी जिम्मेदार अधिकारी या जिला अधिकारी इस छात्रावास की हालत देखने के लिए यहां नहीं आए हैं। अधीक्षक का कहना है कि वे जिला अधिकारी का नाम भी याद नहीं रख पा रहे हैं, जो प्रशासन की उदासीनता को दर्शाता है।

छात्रावास की यह हालत शिक्षा के अधिकार के लिए भी बड़ी चुनौती है। शिक्षा का अधिकार तभी पूरा होता है जब बच्चों को सुरक्षित और साफ-सुथरे वातावरण में रहने और पढ़ाई करने का अवसर मिले। जोका पाठ में रहने वाले बच्चों के लिए फिलहाल ऐसा कोई माहौल उपलब्ध नहीं है।

अंत में कहना होगा कि जोका पाठ छात्रावास की इस खस्ताहाल हालत को सुधारना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है। प्लास्टिक की चादर जो भवन को ढक रही है, वह सिर्फ एक संकेत है कि बच्चों को क्या हालात में रहना पड़ रहा है। उन्हें बेहतर और सुरक्षित जगह चाहिए ताकि वे भय के बिना पढ़ाई कर सकें और अपना भविष्य संवार सकें।

यदि इस तरफ ध्यान और कार्रवाई नहीं हुई, तो यह न केवल एक मानवीय संकट होगा, बल्कि जिले के सामाजिक और शैक्षिक विकास पर भी बुरा असर पड़ेगा। इसलिए प्रशासन को तुरंत इस भवन की मरम्मत या नये छात्रावास का निर्माण करने के लिए कदम उठाना चाहिए ताकि बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो सके।

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