inquiry into the Ramgarh conservation: सरगुजा:छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के उदयपुर ब्लॉक में स्थित ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक महत्व की ramgarh पहाड़ी को बचाने की राह में अब निर्णायक मोड़ आ गया है। छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टी.एस. सिंहदेव की पहल पर केंद्र सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लिया है।
उन्होंने रामगढ़ पहाड़ी के संरक्षण के लिए केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को पत्र लिखकर इस ऐतिहासिक धरोहर को खतरे से बचाने की बात कही थी। इसके बाद मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ सरकार के वन विभाग को पत्र लिखकर इस मामले की जांच और उचित कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। राज्य सरकार से जांच रिपोर्ट मंत्रालय को जल्द प्रस्तुत करने को भी कहा गया है।

inquiry into the Ramgarh conservation टी.एस. सिंहदेव की संवेदनशील पहल
टी.एस. सिंहदेव ने 30 अगस्त 2025 को प्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के वन सलाहकार समिति के अध्यक्ष सुशील कुमार अवस्थी को पत्र लिखा था। इसमें उन्होंने हसदेव अरण्य क्षेत्र में चल रही कोयला खदानों की वजह से रामगढ़ पर्वत के अस्तित्व को आने वाले खतरे पर गंभीर चिंता जताई थी।
सिंहदेव ने बताया कि वन विभाग ने रामगढ़ पहाड़ी के पास स्थित केते-एक्सटेंशन नामक कोयला खदान के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र भी जारी कर दिया है, जबकि वहां की पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक विरासत को देखते हुए यह खदान नुकसानदेह साबित हो सकती है। उन्होंने इसके साथ ही 2019 में वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और ICRF देहरादून द्वारा किए गए जैव विविधता मूल्यांकन का भी हवाला दिया था, जिसमें इस क्षेत्र को खनन के लिए उपयुक्त नहीं माना गया था।

रामगढ़ पहाड़ी को धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत बड़ा महत्व प्राप्त है। यह स्थान भगवान श्रीराम और माता सीता के वनवास संबंधी कथाओं से जुड़ा हुआ है। यहां पर पुराने समय का श्रीराम जानकी मंदिर स्थित है। इसके साथ ही रामगढ़ पहाड़ी नाट्यशास्त्र की प्राचीनतम नाटकशाला के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। हर साल यहां लाखों श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं, जो इसे एक महत्वपूर्ण धार्मिक एवं पर्यटन स्थल बनाते हैं।
हालांकि 2014 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इस क्षेत्र में खदानों के संचालन पर रोक लगा दी थी और केंद्र पर्यावरण मंत्रालय को वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और आईसीएफआरई के माध्यम से क्षेत्रीय जैव विविधता अध्ययन करने के आदेश दिए थे, लेकिन 2023 में भाजपा सरकार बनने के बाद नए कोल प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी गई।
इसके बाद केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक के निकट खनन शुरू हो गया है, जो रामगढ़ पहाड़ी को भूकंपीय खतरों एवं पर्यावरणीय नुकसान के सामने ला रहा है। कोल ब्लॉक के विस्फोटों से पहाड़ी में दरारें आ रही हैं और स्थानीय पर्यावरणीय असंतुलन बढ़ रहा है। 26 जून 2025 को वन विभाग ने धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों जैसे रामजानकी मंदिर से जुड़े तथ्य छुपाते हुए खदान के पक्ष में अनापत्ति जारी की, जो विवादों का कारण बना है। इलाके के आम नागरिक और विशेषज्ञ भी इस खनन विधि के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।
टी.एस. सिंहदेव के इस गंभीर पत्र के बाद केंद्र सरकार ने इसका संज्ञान लिया और केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के महानिदेशक ने छत्तीसगढ़ के वन विभाग के प्रमुख सचिव को लिखकर रामगढ़ पहाड़ी की वर्तमान स्थिति की जांच करने एवं न्यायोचित कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। जांच रिपोर्ट केंद्रीय मंत्रालय तक भेजना भी अनिवार्य किया गया है। इससे मुख्यमंत्री और राज्य सरकार को भी इस मामले में ठोस कदम उठाने का दबाव महसूस हो रहा है। वन विभाग द्वारा दी गई जानकारी और स्थानीय पर्यावरणीय स्थितियों की सटीक जांच के बाद ही आगे का निर्णय लिया जाएगा।
टी.एस. सिंहदेव ने रामगढ़ की रक्षा के लिए स्थानीय जनता और विशेषज्ञों की मदद से ‘रामगढ़ संरक्षण और संवर्द्धन समिति’ का भी गठन किया है। यह समिति गैर-राजनीतिक है और इसका उद्देश्य रामगढ़ पर्वत की पर्यावरणीय, ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरों की रक्षा करना है। समिति लगातार स्थानीय स्तर पर खदानों के विस्तार को रोके जाने के लिए काम कर रही है और लोगों में जागरूकता बढ़ा रही है। इस प्रयास से वहां के आम लोगों में भी रामगढ़ की धरोहर बचाने की उम्मीद जगी है।
रामगढ़ पहाड़ी की सुरक्षा के लिए सरकार, वन विभाग और स्थानीय लोग एक पटल पर आ रहे हैं, जो इस महत्वपूर्ण विरासत को बचाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है। हालांकि आने वाले समय में कोयला खदानों की गतिविधि और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती होगा। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा निर्देशित जांच से उपयुक्त नीतिगत निर्णय और कार्रवाई अपेक्षित हैं। रामगढ़ पहाड़ी की प्राकृतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए निरंतर निगरानी और संवेदनशीलता की जरूरत है।
इस पूरे घटनाक्रम से छत्तीसगढ़ में ऐतिहासिक और पर्यावरणीय संरक्षण की दिशा में एक नई जागरूकता और सक्रियता देखने को मिल रही है। टी.एस. सिंहदेव की पहल से केंद्र सरकार की संज्ञानात्मक कार्रवाई ने स्थानीय समुदाय और संरक्षण समर्थकों को आश्वस्त किया है कि रामगढ़ जैसी विरासतों को बचाने के लिए ठोस प्रयास किए जाएंगे। यह मामला पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन की एक परीक्षा भी साबित होगा।
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