अंबिकापुर नगर निगम के पूर्व महापौर व पार्षदों के 1.43 करोड़ रुपए मानदेय पर हाईकोर्ट के निर्देश : High Court’s directive on the Rs 1.43 crore honorarium for former mayor and councilors of Ambikapur Municipal Corporation

Uday Diwakar
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High Court’s directive on the Rs 1.43 crore honorarium for former mayor and councilors of Ambikapur Municipal Corporation: सरगुजा:​​​अंबिकापुर। अंबिकापुर नगर निगम के पूर्व महापौर और पार्षदों का मानदेय करीब 1.43 करोड़ रुपये से अधिक समय से लंबित बताया जा रहा है। यह राशि निगम परिषद के 2019 से 2025 के कार्यकाल के दौरान जून 2023 से अब तक के बकाया मानदेय से जुड़ी मानी जा रही है।

इस अवधि में मानदेय अटके रहने से तत्कालीन कांग्रेस समर्थित जनप्रतिनिधियों में नाराज़गी बढ़ती गई और मामला अंततः न्यायालय की दहलीज़ तक पहुंचा। पूर्व महापौर सहित कुल 21 पार्षदों ने सामूहिक तौर पर याचिका दायर कर समय पर मानदेय न मिलने को जनप्रतिनिधियों के अधिकारों का उल्लंघन बताया।

हाईकोर्ट में दायर याचिका

याचिकाकर्ताओं ने अपनी अर्जी में कहा कि नगर निगम अधिनियम के तहत पार्षदों और महापौर को नियमित रूप से मानदेय दिया जाना आवश्यक है, ताकि वे निर्वाचित प्रतिनिधि के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें। याचिका में उल्लेख किया गया कि जून 2023 के बाद से मानदेय भुगतान लगातार टलता गया, जबकि निगम के बजट में इसके लिए प्रावधान मौजूद है।

इसके साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि निगम प्रशासन ने बकाया भुगतान के लिए स्पष्ट समयसीमा तय नहीं की और बार‑बार याद दिलाने के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इस वजह से जनप्रतिनिधियों को आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानी झेलनी पड़ी और अंततः न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करनी पड़ी।

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सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं और मामले की गंभीरता को देखते हुए महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया। न्यायालय ने कहा कि निर्वाचित प्रतिनिधियों का मानदेय केवल औपचारिक भुगतान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती से जुड़ा विषय है, इसलिए इसे अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जा सकता।

अदालत ने राज्य सरकार और नगर निगम प्रशासन को स्पष्ट दिशा‑निर्देश जारी करते हुए बकाया मानदेय के शीघ्र निपटारे के आदेश दिए। साथ ही एक समयबद्ध कार्ययोजना तैयार कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए भी कहा गया, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने।

अदालत के निर्देश के बाद नगर निगम प्रशासन पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह आ गई है कि वह लंबित मानदेय के भुगतान के लिए आवश्यक वित्तीय प्रबंध तुरंत करे। इसके तहत निगम को अपने उपलब्ध बजटीय संसाधनों, राज्य वित्त आयोग, अनुदान और स्व-वित्तीय मदों की समीक्षा कर बकाया राशि जारी करनी होगी।

राज्य सरकार के लिए भी यह निर्णय संकेत देता है कि नगर निकायों के वित्तीय प्रबंधन पर सख्त निगरानी रखने की आवश्यकता है। यदि किसी कारण से निकायों की आय में कमी आती है तो भी कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों के वेतन‑मानदेय जैसी प्राथमिक मदों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।

लंबित मानदेय का मुद्दा अंबिकापुर की स्थानीय राजनीति में लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है, जिसे अब न्यायालय के निर्देशों के बाद नया आयाम मिला है। विपक्ष इसे पूर्व परिषद के साथ भेदभाव का उदाहरण बता रहा है, जबकि सत्ताधारी पक्ष वित्तीय संकट और तकनीकी प्रक्रियाओं का हवाला देता रहा है।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद दोनों पक्षों पर यह दबाव बढ़ गया है कि वे आपसी आरोप‑प्रत्यारोप छोड़ कर समाधान की दिशा में कदम बढ़ाएं। यदि तय समयसीमा के भीतर भुगतान हो जाता है तो इससे न केवल पूर्व महापौर और पार्षदों को राहत मिलेगी, बल्कि आम नागरिकों का विश्वास भी बढ़ेगा कि न्याय व्यवस्था जनप्रतिनिधियों के अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय है।

High Court’s directive on the Rs 1.43 crore honorarium for former mayor and councilors of Ambikapur Municipal Corporation

कानूनी रूप से देखा जाए तो यदि निगम और राज्य सरकार अदालत के निर्देशों का पालन करने में देरी करते हैं, तो अवमानना की कार्यवाही की स्थिति भी पैदा हो सकती है। इसलिए संबंधित विभागों के लिए यह आवश्यक है कि वे फाइलों को लंबित रखने या तकनीकी आपत्तियां उठाने के बजाय समय पर निर्णय लें।

पत्रकारिता के दृष्टिकोण से यह मामला नगर निकायों की वित्तीय अनुशासनहीनता, राजनीतिक खींचतान और आम जनप्रतिनिधियों की वास्तविक समस्याओं को एक साथ उजागर करता है। आप इस मसले पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों, निगम अधिकारियों और कानून विशेषज्ञों के बयान जोड़कर अपनी रिपोर्ट को और समृद्ध कर सकते हैं, ताकि पाठकों को पूरे विषय की संतुलित और तथ्यपरक तस्वीर मिल सके।

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