हसदेव अरण्य बचाने अंबिकापुर में धरना, खनन रोकने की चेतावनी, धरना-प्रदर्शन से गूंजा गांधी चौक : Dharna in Ambikapur to save Hasdeo forest

Uday Diwakar
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Dharna in Ambikapur to save Hasdeo forest: सरगुजा: छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में स्थित हसदेव अरण्य को राज्य के हरे-भरे फेफड़े कहकर जाना जाता है। यहां फैले घने साल और सागौन के जंगल, नदियों और जैव विविधता के संरक्षण के लिए पूरे प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर में अहम माने जाते हैं। लेकिन बीते कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में प्रस्तावित और चालू कोयला खनन परियोजनाओं ने इस प्राकृतिक धरोहर पर गंभीर खतरा पैदा कर दिया है। इसी खतरे को रोकने और हसदेव अरण्य को संरक्षित रखने की मांग को लेकर हसदेव बचाओ संघर्ष समिति ने मंगलवार, 23 सितंबर को अंबिकापुर के गांधी चौक में एकदिवसीय धरना प्रदर्शन किया।

धरना-प्रदर्शन में बड़ी संख्या में ग्रामीण, पर्यावरण कार्यकर्ता, छात्र और सामाजिक संगठनों के सदस्य शामिल हुए। सभी ने सरकार से मांग की कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई और खनन परियोजनाओं को तत्काल रोका जाए, अन्यथा आंदोलन को और उग्र स्वरूप दिया जाएगा।

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Dharna in Ambikapur to save Hasdeo forest संघर्ष समिति का ऐलान: “हसदेव हमारी जीवन रेखा है”

धरना स्थल पर उपस्थित हसदेव बचाओ संघर्ष समिति के संयोजकों ने कहा कि हसदेव अरण्य लाखों आदिवासी और ग्रामीणों के जीवन का आधार है। यहां की नदियाँ, जलस्रोत और घने जंगल न केवल आजीविका का सहारा हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्राकृतिक धरोहर भी हैं। लेकिन कोयला खनन के नाम पर लगातार नए-नए प्रोजेक्ट को मंजूरी दी जा रही है, जिससे हजारों पेड़ों की कटाई और सैकड़ों गांवों के विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है।

स्थानीय नेताओं ने स्पष्ट किया कि समिति केवल पर्यावरण की ही नहीं, बल्कि आदिवासी अधिकारों की भी रक्षा के लिए संघर्ष कर रही है। संविधान की पंचम अनुसूची और पेसा कानून के तहत ग्राम सभाओं की अनुमति अनिवार्य होती है, लेकिन कई खनन परियोजनाओं को बिना ग्राम सभा की सहमति के ही स्वीकृति दी गई है। यह न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि आदिवासी समाज के साथ अन्याय भी है।

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गांधी चौक में गूंजे नारे

धरना-प्रदर्शन के दौरान गांधी चौक “हसदेव बचाओ, जीवन बचाओ”, “पेड़ कटेगा तो भविष्य कटेगा”, और “खनन बंद करो, जंगल बचाओ” जैसे नारों से गूंज उठा। प्रदर्शन में शामिल महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए अपने सांस्कृतिक ढंग से विरोध दर्ज कराती रहीं। युवा हाथों में बैनर-पोस्टर लेकर खड़े थे जिन पर लिखा था – “प्रकृति से खिलवाड़ नहीं चलेगा”, “जंगल हमारा, जीवन हमारा”।

धरना में शामिल कार्यकर्ताओं ने प्रशासन को क्षेत्रीय और वैश्विक पर्यावरणीय संतुलन की चिंता करते हुए आगाह किया कि यदि हसदेव अरण्य बचेगा, तभी आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध वायु और पानी मिल पाएगा।

मुख्यमंत्री और राज्यपाल के नाम सौंपा ज्ञापन

धरना प्रदर्शन के बाद समिति के प्रतिनिधिमंडल ने प्रशासन को मुख्यमंत्री और राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में मांग की गई कि –

  • हसदेव अरण्य क्षेत्र में चल रही सभी कोयला खनन परियोजनाओं की स्वीकृति तत्काल निरस्त की जाए।
  • जंगल क्षेत्र में किसी भी कीमत पर पेड़ों की कटाई न की जाए।
  • आदिवासियों और ग्रामीणों की सहमति के बिना किसी भी परियोजना को लागू न किया जाए।
  • पहले से हो चुकी क्षति की भरपाई के लिए बड़े स्तर पर वृक्षारोपण अभियान चलाया जाए।

समिति ने चेतावनी दी कि उनकी मांगें अगर समय रहते पूरी नहीं हुईं तो आने वाले दिनों में आंदोलन को पूरे प्रदेश स्तर पर तेज किया जाएगा।

धरना में वक्ताओं ने राज्य और केंद्र सरकार पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संकट पूरे विश्व के सामने चुनौती बनकर खड़ा है, तब हसदेव जैसे विशाल अरण्य क्षेत्र को नष्ट करना आत्मघाती कदम साबित होगा। उन्होंने कहा कि सरकार विकास के नाम पर प्राकृतिक जंगल और आदिवासी जनजीवन का बलिदान न दे।

कुछ पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा कि कोयला खनन से मिलने वाले आर्थिक लाभ अल्पकालिक होंगे, जबकि जंगलों का नुकसान स्थायी है। ऐसे में पर्यावरणीय न्याय को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

धरना-प्रदर्शन में शामिल ग्रामीणों ने बताया कि जिन गांवों को खनन परियोजनाओं के लिए अधिग्रहीत किया जा रहा है, वहां के लोगों को मुआवजा और पुनर्वास की स्पष्ट गारंटी नहीं मिल रही है। वे जीवनभर अपनी जमीन और जंगल पर निर्भर रहे हैं। मुआवजा लेकर शहरों में जाकर जीना उनके लिए संभव नहीं है।
कई लोगों ने यह भी कहा कि खनन से पानी के स्रोत सूख जाएंगे, खेती-किसानी पर असर पड़ेगा और प्रदूषण से स्वास्थ्य संबंधी संकट खड़े होंगे।

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धरना के दौरान संघर्ष समिति ने यह स्पष्ट किया कि अगर सरकार ने उनकी मांगों पर गौर नहीं किया तो आने वाले दिनों में बड़ा जनआंदोलन खड़ा किया जाएगा। इसमें अंबिकापुर ही नहीं, बल्कि रायपुर और दिल्ली तक विरोध प्रदर्शन किया जाएगा। समिति ने कहा कि यह संघर्ष सिर्फ हसदेव का नहीं, बल्कि पूरे देश के पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों की रक्षा का आंदोलन है।

धरना स्थल पर पहुंचे प्रशासनिक अधिकारियों ने समिति की मांगों को गंभीरता से सुना और ज्ञापन को शासन तक पहुंचाने का आश्वासन दिया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में कदम उठा रही है।

अंबिकापुर के गांधी चौक में हुआ यह धरना-प्रदर्शन हसदेव अरण्य को बचाने की दिशा में एक और बड़ा कदम माना जा रहा है। समिति और ग्रामीणों का कहना है कि अगर जंगल बचेगा तो ही इस क्षेत्र के लोग स्वस्थ और सुरक्षित जीवन जी पाएंगे। प्रशासन और सरकार को अब यह तय करना है कि आर्थिक विकास की दौड़ में क्या वास्तव में पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों की बलि चढ़ाई जाएगी या फिर हसदेव अरण्य को बचाकर भावी पीढ़ियों को एक जीवन्त धरोहर सौंपी जाएगी।

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