Constitutional rebellion against Amera mine: सरगुजा:अंबिकापुर।18 जनवरी 2026: सरगुजा जिले में प्रस्तावित अमेरा ओपन कास्ट कोल माइंस परियोजना को लेकर विरोध अब सियासी, संवैधानिक और मानवाधिकार के मोर्चे पर तेज हो गया है। जिला पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष आदित्येश्वर शरण सिंह देव ने सरगुजा कलेक्टर को एक कड़ा पत्र लिखकर न केवल इस परियोजना को तत्काल निरस्त करने की अनुशंसा की मांग की है, बल्कि ग्राम परसोड़ीकला में ग्रामीणों पर हुए बल प्रयोग को संविधान, कानून और मानवाधिकारों के विरुद्ध बताते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) पर विस्थापित आदिवासियों के साथ वैधानिक प्रावधानों की अनदेखी, मुआवजे में भारी अनियमितता और अधिकारों को छिपाने जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।
3 दिसंबर 2025 को ग्राम परसोड़ीकला में SECL की अमेरा ओपन कास्ट माइंस के विस्तार के दौरान ग्रामीणों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़प ने पूरे सरगुजा को हिला दिया था। ग्रामीणों ने खदान विस्तार का विरोध करते हुए पुलिस पर पथराव किया, जिसमें एएसपी, थाना प्रभारी समेत 25 पुलिसकर्मी घायल हो गए। दूसरी ओर, 12 से अधिक ग्रामीणों को भी चोटें आईं। प्रशासन ने आंसू गैस और लाठियां भांजकर हालात काबू किए। आदित्येश्वर शरण सिंह देव ने पत्र में इस बल प्रयोग को ‘संवैधानिक अवहेलना’ करार देते हुए कहा कि यह ग्रामीणों के शांतिपूर्ण विरोध को कुचलने की कोशिश है। उन्होंने कलेक्टर से इस घटना की निष्पक्ष जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।
पत्र में श्री सिंह देव ने SECL पर विस्थापितों को ठगने के आरोप लगाए हैं। उन्होंने बताया कि कंपनी ने ‘कोल इंडिया एन्युटी स्कीम 2020’ के प्रावधान छिपाए, जिसमें प्रभावितों को 15 से 30 हजार रुपये मासिक पेंशन का अधिकार है। इसके अलावा, ‘भूमि के बदले भूमि’ (लैंड फॉर लैंड) नीति की अनदेखी की गई। ग्रामीणों को मात्र 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया गया, जबकि वे 91 लाख रुपये के हकदार हैं। अमेरा माइन की 664 हेक्टेयर जमीन 2001 में कोल बेयरिंग एक्ट के तहत अधिग्रहित की गई थी, लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि सहमति नहीं ली गई। SECL ने अब तक 10 करोड़ का मुआवजा वितरित किया है, लेकिन कई ग्रामीणों ने इसे अस्वीकार कर दिया।
श्री सिंह देव ने पत्र में सर्वोच्च न्यायालय के ‘समता जजमेंट’ और वन अधिकार अधिनियम (PESA) का हवाला देते हुए कहा कि ग्राम सभा की स्वतंत्र सहमति के बिना परियोजना थोपी जा रही है। उन्होंने ग्राम सभा को ‘लोकतंत्र का आधार’ बताते हुए SECL की कार्रवाई को असंवैधानिक ठहराया। खदान 2011 से चालू हुई, 2019 तक चली, लेकिन अवैध कोयला कारोबारियों के प्रभाव में रुक गई। 2024 में राज्य प्रशासन के सहयोग से फिर शुरू हुई, लेकिन परसोड़ीकला विस्तार ने विवाद बढ़ा दिया। पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने कहा था कि ग्रामीण न चाहें तो खदान नहीं खुलेगी। राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष भानू प्रताप सिंह ने भी भूमि नियमों का हवाला देकर विरोध जताया।
अमेरा ओपन कास्ट माइंस बिश्रामपुर एरिया में 1 मिलियन टन प्रति वर्ष क्षमता वाली है, जो परसोड़ीकला, अमेरा, पुहपुत्रा और कटकोना गांवों में फैली है। SECL ने संचालन एलएंडसी (LCC) कंपनी को सौंपा है, जिसका करोड़ों का निवेश डूब रहा है। प्रशासन का कहना है कि जमीन अधिग्रहण 2016 में पूरा हो चुका, लेकिन ग्रामीण अवैध तत्वों के बहकावे में हैं। खदान से कोयला उत्पादन बढ़ेगा, जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है, लेकिन पर्यावरणविद् जंगलों और आदिवासी संस्कृति के विनाश की चेतावनी दे रहे हैं।
आदित्येश्वर शरण सिंह देव का पत्र सियासत को नया मोड़ दे रहा है। उन्होंने सरकार पर सौर ऊर्जा के नाम पर सब्सिडी खत्म करने और कोयला थोपने का आरोप लगाया। कांग्रेस और स्थानीय संगठन इसका समर्थन कर रहे हैं। राज्य सरकार ने अब तक चुप्पी साधे रखी है, लेकिन कलेक्टर से जवाब की उम्मीद है। आदिवासी संगठनों ने धरना-प्रदर्शन की चेतावनी दी है।
Constitutional rebellion against Amera mine
सरगुजा के घने जंगलों में बसे आदिवासी समुदाय की आजीविका कृषि और वन पर निर्भर है। अमेरा प्रोजेक्ट से सैकड़ों प्रभावित होंगे, लेकिन मुआवजा और पुनर्वास अपर्याप्त है। श्री सिंह देव ने कहा, “सरगुजा का चरित्र आदिवासी संस्कृति है, इसे बचाना जरूरी।” उन्होंने कलेक्टर से तत्काल हस्तक्षेप की अपील की।
यह विवाद न केवल स्थानीय है, बल्कि कोयला खनन नीति, आदिवासी अधिकार और विकास मॉडल पर सवाल खड़े कर रहा है। कलेक्टर का जवाब तय करेगा कि अमेरा का भविष्य क्या होगा। फिलहाल, ग्रामीण सतर्क हैं और विरोध की आग धधक रही है।
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