अंबिकापुर में मुख्यमंत्री का कार्यक्रम बना ट्रैफिक जाम का कारण, आम जनता के लिए नियम और नेताओं के लिए छूट? : Chief Minister’s program in Ambikapur became the reason for traffic jam rules for the general public and exemption for the leaders?

Uday Diwakar
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Chief Minister’s program in Ambikapur became the reason for traffic jam rules for the general public and exemption for the leaders?: सरगुजा:अंबिकापुर में मुख्यमंत्री के कार्यक्रम को लेकर सड़क जाम और आम जनता के लिए लागू दोहरे मापदंडों पर गहरी नाराजगी सामने आ रही है। जहां आम नागरिकों को सार्वजनिक सड़कों पर किसी भी निजी आयोजन हेतु नियमों की दुहाई देकर कार्रवाई की जाती है, वहीं बड़े नेताओं, अधिकारियों और खास आयोजनों के लिए कठिन कानून भी निष्क्रिय नजर आते हैं। यह घटना न सिर्फ स्थानीय जनता की परेशानी को उजागर करती है, बल्कि कानून के समक्ष सबकी समानता के सवाल को भी समाज के समक्ष खड़ा करती है।​

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने हाल ही में अंबिकापुर नगर निगम की सामान्य सभा के अवसर पर शहर का दौरा किया। इस यात्रा के दौरान शहर के महत्वपूर्ण मार्गों को कार्यक्रम की तैयारी और सुरक्षा के लिए अस्थायी तौर पर बाधित कर दिया गया। नतीजतन, आम नागरिकों के लिए मुख्य सड़कों पर आवाजाही बाधित हुई, जिससे ट्रैफिक जाम और लोगों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा. नागरिकों ने यह भी बताया कि अस्पताल, स्कूल व जरूरी स्थानों पर समय पर पहुंचना मुश्किल हो गया।

आम जनता या गरीब तबके के लोग जब सड़क किनारे श्राद्ध भोज या सब्जी बेचने का प्रयास करते हैं, तो नगर निगम के अधिकारी नियमों का हवाला देकर तुरंत कार्रवाई करते हैं। कई बार प्रशासन छोटे दुकानदारों और फेरीवालों पर सख्ती से सड़क खाली करवाता है, यह कहते हुए कि सार्वजनिक स्थल पर अवरोध बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. लेकिन जब सरकार या उच्च पदस्थ व्यक्तियों के कार्यक्रम होते हैं, तो उन्हीं सार्वजनिक मार्गों को घंटों के लिए अवरुद्ध किया जाता है एवं ट्रैफिक डायवर्ट किया जाता है। इस भेदभावपूर्ण रवैये को लेकर समाज में आक्रोश है।​

अंबिकापुर में सड़कों की खराब हालत और प्रशासन की उपेक्षा को लेकर स्थानीय निवासियों और सामाजिक संगठनों ने अनोखे तरीके से विरोध जताया। छठ पर्व के दौरान श्रद्धालुओं तथा आम नागरिकों को जर्जर और गड्ढे से भरी सड़कों से गुजरना पड़ा, जिस पर कहीं भी प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया। जब नागरिकों ने ‘सिस्टम का श्राद्ध’ जैसा प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया, तब प्रशासन ने कोई ठोस समाधान नहीं निकाला।​​

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हाल ही में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भी ऐसे मामलों पर प्रशासन की ढिलाई को लेकर सख्त टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने कहा कि चाहे वह बड़े व्यापारी का बेटा हो या तकनीकी रील बना रहे युवा, यदि वे सड़कों को बाधित करते हैं, तो उन पर सख्त से सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए. परंतु जारी वास्तविकता यह है कि आम नागरिकों पर तुरंत जुर्माना, चालान और अन्य कानूनी कार्रवाई कर दी जाती है, जबकि संपन्न या ताकतवर लोगों पर केवल औपचारिक जुर्माना लगाकर छोड़ दिया जाता है।

अक्सर देखा गया है कि नेताओं के कार्यक्रम या वीआईपी मूवमेंट के दौरान पुलिस प्रशासन गैर-जरूरी सख्ती दिखाता है, तमाम नियमों को नजरअंदाज कर देता है और आम जनता को लंबा इंतजार या परेशानी उठानी पड़ती है. चाहे अस्पताल पहुंचती एंबुलेंस हो या ऑफिस जाने वाले कामकाजी लोग—किसी की निजता, सुगमता या जरूरतों का ख्याल नहीं रखा जाता।

कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं ने सीधे सवाल उठाए हैं—क्या देश में कानून वास्तव में सबके लिए समान है? यदि सड़क पर आयोजन या बाधा आम जन द्वारा की जाती है, तो उन पर कठोरता से कार्रवाई होती है, लेकिन शक्तिशाली या प्रभावशाली लोगों के लिए सारे नियम शिथिल क्यों हो जाते हैं? ऐसा लगता है कि “समरथ को न दोष गोसाई” जैसी कहावत आज भी व्यवस्था पर लागू हो रही है।

Chief Minister’s program in Ambikapur became the reason for traffic jam rules for the general public and exemption for the leaders?

इस तरह की घटनाओं के दोहराव से पुलिस और प्रशासन की साख तथा कानून-व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सख्ती और निष्पक्षता के साथ, सड़क बाधा पैदा करनेवालों पर समान रूप से कार्रवाई होनी चाहिए—चाहे वे आम नागरिक हों या कोई उच्च पदस्थ व्यक्ति। तभी सिस्टम में विश्वास बनेगा और सबको संवैधानिक अधिकार और न्याय मिलेगा।

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अंबिकापुर का हालिया मामला न सिर्फ एक कार्यक्रम के बहाने सड़क पर अव्यवस्था का उदाहरण है, बल्कि उस व्यवस्था का आईना भी है जिसमें शक्तिशाली लोगों के लिए नियम शिथिल और जनता के लिए कड़े बना दिए जाते हैं. यदि यह प्रवृत्ति नहीं रूकी तो “एक देश, एक कानून” का सपना अधूरा ही रहेगा और आम जनता अपने आपको हमेशा हाशिए पर ही पाएगी।

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