छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का फैसला: हसदेव अरण्य में कोयला खनन को मिली कानूनी मंजूरी : Chhattisgarh High Court verdict Coal mining in Hasdeo Aranya gets legal approval

Uday Diwakar
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Chhattisgarh High Court verdict Coal mining in Hasdeo Aranya gets legal approval: बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सरगुजा जिले के हसदेव अरण्य क्षेत्र में कोयला खनन परियोजना को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए लंबित याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने अपने निर्णय में यह स्पष्ट किया कि कोयला खनन के लिए दी गई कानूनी मंजूरी में कोई अनियमितता नहीं पाई गई। इस फैसले के साथ ही हसदेव अरण्य में कोयला खनन को वैधानिक मंजूरी मिल गई है।

हसदेव अरण्य छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले का एक प्रमुख वन क्षेत्र है, जिसे जैवविविधता और स्थानीय समुदायों के पारंपरिक अधिकारों के लिए जाना जाता है। पिछले कुछ वर्षों में राज्य सरकार ने यहां के कोल ब्लॉकों को खनन के लिए आवंटित किया, जिसके विरोध में हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति और अनेक ग्रामीणों ने याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि 2006 के वन अधिकार अधिनियम के तहत क्षेत्र के ग्रामीणों को सामुदायिक वन अधिकार मिले थे, जिनका उल्लंघन कर खनन की मंजूरी दी गई।

याचिका में मुख्य रूप से यह कहा गया कि ग्रामसभा और स्थानीय निवासियों की सहमति के बिना कोयला खनन की अनुमति दी गई, जो गैरकानूनी है। खनन से पर्यावरणीय नुकसान, स्थानीय निवासियों के आजीविका और पक्षियों-प्राणियों की जैवविविधता पर भी गंभीर खतरा बताया गया।

राज्य सरकार की पक्ष में पेश हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता और राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड की ओर से तर्क दिया गया कि कोल ब्लॉक का आवंटन संसद द्वारा पारित कोल माइंस (स्पेशल प्रोविजन) एक्ट, 2015 के तहत हुआ है। चूंकि यह अधिनियम अन्य सभी कानूनों पर प्राथमिकता रखता है, इसलिए वन अधिकार कानून बाधक नहीं हो सकता।

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Chhattisgarh High Court verdict Coal mining in Hasdeo Aranya gets legal approval

हाई कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2012 व 2022 में पारसा ईस्ट एंड केंते बासन (PEKB) कोल ब्लॉक के फेज-1 व फेज-2 में खनन के लिए दी गई मंजूरी की प्रक्रियाओं पर संतोष प्रकट किया। न्यायालय ने यह कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों में ग्रामसभा की बैठकों या अभिलेखों में सामुदायिक वन अधिकारों से संबंधित कोई वैध दावा या प्रमाण नहीं मिला। इसी आधार पर जिला समिति द्वारा 2016 में सामुदायिक अधिकारों को रद्द करने का आदेश भी उचित पाया गया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता न तो ग्रामसभा की ओर से अधिकृत थे और न ही सामुदायिक अधिकारों का कोई वैधानिक दावा सिद्ध कर पाए। अदालत ने कहा कि खनन परियोजना को वैध तरीके से कानूनी प्रक्रियाओं के तहत मंजूरी मिली है और इसमें कोई अनियमितता नहीं पाई गई।

हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति का कहना था कि खनन परियोजना से 1742 हेक्टेयर वन भूमि डायवर्ट की जाएगी, और छः लाख से अधिक पेड़ों की कटाई होगी। समितियों ने यह भी कहा था कि 2022 में विधानसभा ने क्षेत्र में खनन रोकने का संकल्प लिया था, लेकिन उसकी अवहेलना हो रही है। पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कोर्ट में यह भी प्रस्तुत किया कि क्षेत्र में मानव-हाथी संघर्ष, जल स्रोतों के सूखने और ग्रामवासियों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

राज्य सरकार और राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड ने यह दलील दी कि संसद का कोल माइंस एक्ट, 2015, अन्य सभी अधिनियमों पर प्रभावी है, और खनन के लिए सभी आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन किया गया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति स्वयं कोई वैधानिक संस्था नहीं है, और इस कारण से ग्रामसभा या गांववालों की ओर से सामुदायिक अधिकार का दावा नहीं कर सकती।

हसदेव अरण्य में खनन के खिलाफ पर्यावरण संगठनों का विरोध जारी है। उनका कहना है कि इससे छत्तीसगढ़ की जलवायु, जैवविविधता, प्राकृतिक जंगल और जल स्रोतों को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी। विरोधी संगठनों ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख भी किया, जहां सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिपूरक वनीकरण और पर्यावरणीय नुकसान पर राज्य सरकार से जवाब मांगा था.

फैसले से छत्तीसगढ़ सरकार और कोल ब्लॉक ऑपरेटर को कानूनी राहत तो मिल गई, लेकिन स्थानीय स्तर पर असंतोष और विरोध की लहर बनी हुई है। कई सामाजिक संगठन अब भी खनन रोकने के लिए उच्चतर मंचों पर कानूनी संघर्ष जारी रखने की बात कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में अभी प्रतिपूरक वनीकरण, पर्यावरणीय संतुलन और ग्रामसभा की भूमिका को लेकर सुनवाई जारी है।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के फैसले से प्रशासन और खनन कंपनियों को कानूनी सुरक्षा अवश्य मिली, लेकिन हसदेव अरण्य का भविष्य—पर्यावरण, जैवविविधता व स्थानीय समुदायों के हक—अब सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का केंद्रीय विषय बन चुका है। यह मामला आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ के विकास, पर्यावरण नीति और जन-आंदोलनों के लिए मिसाल बन सकता है।

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