Bastar Dussehra The longest and unique festival of Chhattisgarh: बस्तर:छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में मनाया जाने वाला दशहरा त्योहार न केवल क्षेत्रीय स्तर पर बल्कि पूरे विश्व में अपनी विशिष्टता के लिए जाना जाता है। यह त्योहार लगभग 75 दिनों तक चलता है और इसे दुनिया के सबसे लंबे दशहरे के रूप में भी माना जाता है। बस्तर दशहरा का धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक महत्व अत्यंत गहरा है, जो क्षेत्र की आदिवासी जीवनशैली, परंपराओं और तंत्र-मंत्र की झलक प्रस्तुत करता है। इस लेख में बस्तर दशहरा के इतिहास, प्रमुख अनुष्ठान, सांस्कृतिक अर्थ, और सामाजिक पहलुओं का विस्तृत वर्णन किया गया है।

बस्तर दशहरे का इतिहास
बस्तर दशहरा की परंपरा 13वीं से 15वीं शताब्दी के बीच चली आ रही है। कहा जाता है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के राजा पुरुषोत्तम देव ने इस त्योहार की शुरुआत की थी। उस समय राजा ने माता दंतेश्वरी की पूजा-अर्चना के लिए यह विपुल पर्व मनाने की परंपरा शुरू की। बस्तर दशहरा, श्री रामायण के दशहरा से अलग है क्योंकि इसे रावण वध की कथा से जोड़ा नहीं गया है। यहाँ देवी दंतेश्वरी की आराधना और पूजा का केंद्र होता है, जो क्षेत्र के आदिवासियों की कुल देवी हैं। इसलिए बस्तर दशहरा एक देवी पूजा त्योहार के रूप में मनाया जाता है और इसमें रावण वध की रस्म नहीं होती।

Bastar Dussehra The longest and unique festival of Chhattisgarh बस्तर दशहरा के प्रमुख अनुष्ठान
- पाठ जात्रा (लकड़ी लाने की रस्म)
यह परंपरा त्योहार की शुरुआत को दर्शाती है, जिसमें जंगल से बड़े-बड़े लकड़ी के टुकड़े लाई जाती हैं। इस लकड़ी से देवी के विशाल रथ का निर्माण किया जाता है। तथाकथित ‘टुरलु खोटला’ लकड़ी का हिस्सा वहीं रखा जाता है, जहाँ पूजा के औजार और अन्य आवश्यक सामग्री संग्रहित होती हैं। - दंतेश्वरी मंदिर का पूजन
जगदलपुर में स्थित दंतेश्वरी मंदिर बस्तर दशहरा का धार्मिक केंद्र है। मां दंतेश्वरी की विशेष पूजा अनुष्ठान पूरे त्योहार में होती है। यह माता बस्तर की रक्षा करती हैं और उन्हें समस्त जनजातीय समुदाय अत्यंत श्रद्धा के साथ पूजते हैं। - काछिन गादी स्थापना
यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान है, जिसमें देवी का प्रतिनिधि आधिकारिक तौर पर नियुक्त किया जाता है। इस ‘गादी’ को स्थापित करना राजपरिवार का पूराना रीति-रिवाज है, जो सामाजिक और धार्मिक एकता का प्रतीक माना जाता है। - देवी दंतेश्वरी की विशाल रथयात्रा
बस्तर दशहरा का सबसे प्रमुख आकर्षण विशाल और अलंकृत रथ की यात्रा है। यह रथ चार या आठ पहियों वाला होता है और हजारों श्रद्धालु इसे हाथों से खींचते हैं। रथ यात्रा पूरे नगर में धूमधाम से होकर गुजरती है। रथ पर देवी की मूर्ति प्रतिष्ठित होती है, और यह यात्रा स्थानीय लोगों के लिये अत्यंत पावन होती है। - डेरी गढ़ाई
यह अनुष्ठान जंगल से चुनी गई विशिष्ट लकड़ी से देवी को बलि देने का होता है। इस रस्म में मटर, मछली, अंडा और अन्य सामग्रियों का बलिदान किया जाता है। देवता की अनुमति के बिना रथ निर्माण संभव नहीं होता है, इसलिए यह अनुष्ठान बहुत महत्त्वपूर्ण है। - मावली देवी का स्वागत
मावली देवी दंतेश्वरी की सहायक देवी मानी जाती हैं। दशहरा के पश्चात मावली देवी की डोली के साथ नगर में भव्य जुलूस निकाला जाता है, जहाँ उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। - मावली परची, भितर और बाहर रैनी
ये तीन अनुष्ठान बस्तर दशहरा के सांस्कृतिक और कृषि चक्र से जुड़े हुए हैं। मावली परची में देवी की ओर से शुभसूचना भेजी जाती है। भितर रैनी में नगर की गलियों को सजाया जाता है, और बाहर रैनी में फसल की खुशियों का उत्सव मनाया जाता है। - मुरिया दरबार
दशहरे के अंतिम दिनों में आदिवासी समुदाय की लोकतांत्रिक परंपरा मुरिया दरबार का आयोजन होता है। यह एक जनजातीय सभा होती है जहाँ सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक मुद्दों पर चर्चा होती है। इस सभा में जनजाति के मुखिया, मांझी और अन्य प्रतिनिधि भाग लेते हैं। - सेवक की भूमिका
बस्तर दशहरा में राजा ‘सेवक’ के रूप में उपस्थित होता है, जो सेवा भावना और प्रशासनिक कार्यों का प्रतीक होता है। राजा स्वयं पूजा, अनुष्ठान और सामाजिक कामकाज में पूरी निष्ठा से हिस्सा लेते हैं।

बस्तर दशहरा का सांस्कृतिक महत्व
- बस्तर दशहरा जनजातीय संस्कृति का दर्पण है, जिसमें जनजातीय पहनावा, लोक संगीत और नृत्य, तंत्र-मंत्र की परंपराएं प्रमुख हैं। इस त्योहार में मुड़िया, गोंड, भतरा, धानकड़ जैसी कई जनजातियां भाग लेती हैं और अपने रीति-रिवाजों का प्रदर्शन करती हैं।
- दशहरे के दौरान स्थानीय बाजारों में पारंपरिक हस्तशिल्प, कृषि उत्पाद और मुदित भोजन उपलब्ध होते हैं, जो आदिवासी जीवन की समृद्धि का परिचायक हैं।
- सामाजिक सौहार्द, सामूहिक सहयोग और जनजातीय लोकतंत्र का भी यह त्योहार जगजाहिर है। मुरिया दरबार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां समुदाय आपसी समस्याओं का समाधान निकालने में सक्रिय होता है।
- आदिवासी समाज में पशु बलि की परंपरा भी होती है, जो देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए की जाती है। यह परंपरा स्थानीय विश्वास और सांस्कृतिक प्रतीकों के अनुरूप है।
पर्यटक आकर्षण
हर वर्ष हजारों देशी-विदेशी पर्यटक बस्तर दशहरा देखने के लिए जगदलपुर आते हैं। पीछे हटते जंगलों, आदिवासी जीवनशैली, रंग-बिरंगे बाजे-गाजे, तांत्रिक अनुष्ठान, और ऊर्जा से भरपूर लोकनृत्यों का अनुभव पर्यटकों को एक अलग ही दुनिया की सैर कराता है। पर्यटक यहां देवी की विशाल रथ यात्रा, मावली देवी की डोली यात्रा, और मुरिया दरबार की लोकसभा का हिस्सा बन पाते हैं।
सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
बस्तर दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी जीवित रखता है। त्योहार के दौरान स्थानीय कला, हस्तशिल्प, वस्त्र, और कृषि वस्तुओं की बिक्री से हजारों लोगों को रोजगार मिलता है। साथ ही यह उत्सव सामाजिक चेतना, समरसता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का भी एक माध्यम है।
बस्तर दशहरा का त्योहार छत्तीसगढ़ की आदिवासी संस्कृति, धार्मिक आस्था और सामाजिक एकता का सशक्त प्रमाण है। यह छत्तीसगढ़ व भारत की सांस्कृतिक धरोहरों में से एक महत्वपूर्ण विरासत है जो पीढ़ी दर पीढ़ी संजोती आ रही है। अपनी विशिष्ट पूजा-पद्धति, तंत्र-मंत्रिक अनुष्ठान और सामाजिक समरसता के कारण यह त्योहार दिलचस्प और विश्वविख्यात है। बस्तर दशहरा न केवल धार्मिक उत्सव है, बल्कि पूरी आदिवासी सभ्यता की जीवित गाथा है जो हर साल हजारों लोगों को आकर्षित करता है।
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