अंगाकर रोटी: छत्तीसगढ़ की मिट्टी और संस्कृति से जुड़ी स्वास्थ्यवर्धक और स्वादिष्ट परंपरा : Angakar Roti of Chhattisgarh

Uday Diwakar
7 Min Read
  • छत्तीसगढ़ की स्वादिष्ट अंगाकर रोटी: परंपरा और स्वाद का मेल
  • अंगार पर पकाई जाने वाली छत्तीसगढ़ी अंगाकर रोटी
  • पलाश के पत्तों में समाई सुगंध और अंगार की आंच में पकी अंगाकर रोटी का सांस्कृतिक महत्व

Angakar Roti of Chhattisgarh: अंगाकर रोटी छत्तीसगढ़ की पारंपरिक और लोकप्रिय रोटी में से एक है। यह रोटी खास तौर पर छत्तीसगढ़ के ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में अत्यंत प्रिय है। इसे बचे हुए चावल और चावल के आटे से बनाया जाता है। इसका नाम “अंगाकर” इसलिए पड़ा क्योंकि इसे तवे पर नहीं बल्कि कोयले या कंडे की आंच पर पकाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में अंगरा या अंगाकर कहा जाता है। अंगाकर रोटी बनाते समय इसे पलाश के पत्तों में लपेटकर सीधे अंगारों पर सेंका जाता है, जिससे इसके स्वाद और खुशबू में एक अलग ही मिठास आ जाती है।

अंगाकर रोटी का सांस्कृतिक महत्व

अंगाकर रोटी छत्तीसगढ़ के ग्रामीण जीवनशैली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह सिर्फ भोजन ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की सादगी, प्रकृति के साथ जुड़ाव और सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक भी है। ग्रामीण परिवारों में यह रोटी रोजाना बनाई जाती है, खासतौर पर जब चावल बच जाता है तब इसकी तैयारी होती है। यह भोजन कम संसाधनों मगर अधिक पोषण प्रदान करता है, जिससे छत्तीसगढ़ की आदिवासी और ग्रामीण संस्कृति की झलक मिलती है।

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Angakar Roti of Chhattisgarh

अंगाकर रोटी अपने खास पकाने के तरीके, उपयोग में आने वाली सामग्रियों और उसकी सुगंध के लिए प्रसिद्ध है। पलाश के पत्तों से लपेटकर पकाने की प्रथा केवल इस रोटी को ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के कई अन्य व्यंजनों को भी पारंपरिक और प्राकृतिक स्वाद देती है। यह तरीका भोजन को कोयले की आंच से सीधे संपर्क में आने से बचाता है और रोटी को जला होने से बचाता है।

अंगाकर रोटी कैसे बनती है?

अंगाकर रोटी बनाने के लिए मुख्य सामग्री पका हुआ चावल, चावल का आटा, नमक, पलाश के पत्ते और कंडे (गोबर या कोयले के जलते अंगारे) होते हैं। इसकी तैयारी में सबसे पहले चावल आटे को नमक और गर्म पानी से मुलायम आटा गूंथा जाता है। इसके बाद पके हुए चावल को अच्छी तरह मैश (मसल) कर आटे में मिलाया जाता है। इस मिश्रण को अच्छे से मिलाकर एक लोई बनाई जाती है।

फिर एक बड़े थाली या परात में पलाश के पत्ते धोकर बिछा दिए जाते हैं। आटे की लोई को हाथ से दबाकर गोल आकार में बेल कर पलाश के पत्तों पर रखा जाता है। इसके बाद ऊपर से फिर से पलाश के पत्ते से ढक दिया जाता है। इस पूरी रोटी को जलते हुए कंडे या अंगारों के बीच रखा जाता है, साथ ही ऊपर से भी अंगारे रख दिए जाते हैं। इससे रोटी दोनों तरफ से धीमी आंच पर एक समान पकती है।

पको हुई अंगाकर रोटी से पलाश के पत्तों की सौंधी खुशबू निकलती है, जो खाने वाले को इसकी प्राकृतिकता का अहसास कराती है। इसे आमतौर पर गरमागरम देसी घी के साथ और टमाटर, धनिया, मिर्च की चटनी के साथ परोसा जाता है।

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स्वास्थ्य और पोषण

अंगाकर रोटी स्वास्थ्य के लिहाज से भी अच्छी मानी जाती है। चावल के आटे से बनने के कारण यह हल्की और सुपाच्य होती है। इसमें कोई भी अतिरिक्त तेल, घी या मसाला नहीं डाला जाता, इसलिए यह शरीर को अधिक तृप्त करने के साथ-साथ पाचन में भी सहायक होती है। पलाश के पत्तों में प्राकृतिक जड़ी-बूटियों जैसे गुण होते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद मानें जाते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में जहां भोजन के साधन सीमित होते हैं, अंगाकर रोटी पोषण का भरपूर स्रोत है और इसे कम लागत में बनाया जा सकता है। यह स्थानीय खाद्य संसाधनों के सदुपयोग का उदाहरण भी है, जो पर्यावरण के अनुकूल भी है।

अंगाकर रोटी पारंपरिक व्यंजनों में स्थान

छत्तीसगढ़ के पारंपरिक व्यंजनों में अंगाकर रोटी का विशेष स्थान है। धुसका, फरा, मुठिया जैसे व्यंजनों के साथ यह रोटी छत्तीसगढ़ के खाने की शान बनी हुई है। पारंपरिक त्योहारों, शादी-ब्याह और अन्य सामाजिक समारोहों में इस रोटी का होना जरूरी होता है।

आज भी गांवों में अधिकांश महिलाएं अंगाकर रोटी बनाने के लिए पलाश के पत्तों और कंडे की आंच की विधि अपनाती हैं। इस रोटी को बनाने और खाने की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचित होती जा रही है, जिससे छत्तीसगढ़ी संस्कृति की पहचान बनी रहती है।

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आधुनिक समय में अंगाकर रोटी

बढ़ते समय के साथ अब अंगाकर रोटी की मांग शहरों में भी बढ़ रही है। कई होटलों और रेस्तरांओं में इसे छत्तीसगढ़ी भोजन के रूप में चलन में लाया जा रहा है। पर्यटक विशेष रूप से अंगाकर रोटी का स्वाद लेना पसंद करते हैं, क्योंकि यह उनकी यात्रा के अनुभव को और भी यादगार बना देती है।

सरकारी स्तर पर भी छत्तीसगढ़ सरकार ने इस रोटी को राज्य के पारंपरिक और सांस्कृतिक खानपान का हिस्सा मान्यता दी है। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई अभियान चलाए जा रहे हैं, जिनमें अंगाकर रोटी जैसे व्यंजनों को प्रमुखता से दिखाया जा रहा है।

अंगाकर रोटी सिर्फ एक भोजन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की संस्कृति, परंपरा, और प्राकृतिक संसाधनों का जीवंत प्रतीक है। इसका पारंपरिक तरीका, प्राकृतिक सामग्री और स्वास्थ्यवर्धक गुण इसे हर उम्र के लोगों में लोकप्रिय बनाते हैं। यह रोटी छत्तीसगढ़ के वनांचल के खानपान में एक अहम भूमिका निभाती है और इसके जरिए छत्तीसगढ़ की विविधता और सादगी दोनों झलकती हैं।

यदि कभी छत्तीसगढ़ आएं तो अंगाकर रोटी का स्वाद लेना न भूलें, क्योंकि यह स्वाद सिर्फ भूख मिटाने का माध्यम नहीं, बल्कि प्रकृति और संस्कृति से जुड़ने का अनुभव है।

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