रायपुर। छत्तीसगढ़ सरकार के कृषि एवं जनजातीय विकास मंत्री रामविचार नेताम ने कहा है कि जनजातीय कला, संस्कृति, पारंपरिक शिल्प और हस्तनिर्मित उत्पादों को बड़ा बाजार मिलना जनजातीय कारीगरों के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि ‘आदि बाजार 2026’ जैसे आयोजन जनजातीय शिल्पकारों की मेहनत को उचित मूल्य दिलाने के साथ ही उनके उत्पादों की नई पहचान बनाने और रोजगार के अवसर बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएंगे।
मंत्री नेताम ने शनिवार को राजधानी रायपुर के टाउन हॉल में भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास महासंघ, ट्राइफेड के क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय जनजातीय महोत्सव ‘आदि बाजार 2026’ का शुभारंभ किया। यह आयोजन 2 नवंबर 2026 तक चलेगा। इस दौरान देश के विभिन्न राज्यों से आए जनजातीय कारीगर, शिल्पकार और कलाकार अपने उत्पादों का प्रदर्शन तथा सीधी बिक्री कर सकेंगे।
जनजातीय विरासत का संरक्षण जरूरी
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मंत्री नेताम ने कहा कि जनजातीय समाज की कला, संस्कृति और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही पारंपरिक कारीगरी देश की अनमोल विरासत है। जनजातीय कारीगर अपनी संस्कृति, परंपरा, जीवनशैली और स्थानीय विशेषताओं को अपनी कलाकृतियों एवं उत्पादों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। इन उत्पादों को व्यापक बाजार और बेहतर विपणन सुविधाएं देना आवश्यक है, ताकि कारीगरों को उनकी मेहनत का वाजिब दाम मिल सके।
उन्होंने बताया कि बड़े शहरों में पारंपरिक और जनजातीय उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। हस्तनिर्मित सामान, पारंपरिक आभूषण और शिल्पकृतियों को अब लोग घर की सजावट तथा संग्रह के लिए भी पसंद कर रहे हैं। ऐसे में ‘आदि बाजार’ जैसे मेले कारीगरों को अपने उत्पादों को सीधे ग्राहकों तक पहुंचाने और नए बाजार तलाशने का अवसर देते हैं।
कारीगरों के लिए साझा मंच
मंत्री नेताम ने कहा कि विभिन्न राज्यों से आए कारीगरों को एक मंच पर अपनी कला और हुनर प्रदर्शित करने का मौका मिलना सराहनीय है। इससे न केवल पारंपरिक कला को नई पहचान मिलेगी, बल्कि कारीगर एक-दूसरे की तकनीक, कार्यशैली और उत्पाद निर्माण की पद्धति को भी समझ सकेंगे। इससे उनका अनुभव बढ़ेगा और उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार के साथ नवाचार को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देते हैं और देश के विभिन्न जनजातीय समुदायों के बीच आपसी जुड़ाव मजबूत करते हैं। जनजातीय कारीगरों की प्रतिभा से निर्मित उत्पादों की अपनी विशेष पहचान है, इसलिए इन्हें बड़े बाजारों से जोड़ना जरूरी है।
मंत्री नेताम ने ट्राइफेड के प्रयासों की सराहना करते हुए सुझाव दिया कि छत्तीसगढ़ राज्योत्सव में भी ट्राइफेड का स्टॉल लगाया जाए, ताकि अधिक से अधिक लोग जनजातीय उत्पादों और उनकी विशेषताओं से रूबरू हो सकें। उन्होंने कहा कि इन उत्पादों की बिक्री बढ़ने से कारीगरों की आय बढ़ेगी और उन्हें बेहतर आजीविका के अवसर मिलेंगे।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि ट्राइफेड से जुड़े पंजीकृत संस्थाओं और कारीगरों के बीच समय-समय पर प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएं। इससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, कारीगरों के कौशल में सुधार होगा और उत्पादों की गुणवत्ता भी बेहतर होगी।
वनोपज आधारित उत्पादों पर जोर
मंत्री नेताम ने कहा कि जनजातीय समुदाय वन एवं लघु वनोपज से जुड़े पारंपरिक उत्पाद, जड़ी-बूटी आधारित सामग्री और स्थानीय संसाधनों से बने उत्पादों के निर्माण में भी अहम भूमिका निभाते हैं। ट्राइफेड के माध्यम से इन उत्पादों को बाजार से जोड़ने और उनका व्यापक प्रचार करने के निरंतर प्रयास होने चाहिए। इससे जनजातीय उद्यमियों, कारीगरों और शिल्पकारों को आगे बढ़ने के नए अवसर मिलेंगे।
80 कारीगरों के लगभग 30 स्टॉल
दस दिवसीय ‘आदि बाजार 2026’ में देश के विभिन्न हिस्सों से आए लगभग 80 जनजातीय कारीगरों और शिल्पकारों के लगभग 30 स्टॉल लगाए गए हैं। यहां आगंतुक पारंपरिक हस्तशिल्प, हैंडलूम उत्पाद, वस्त्र, पारंपरिक आभूषण, चित्रकला तथा प्राकृतिक एवं जैविक उत्पाद खरीद सकते हैं।
प्रदर्शनी में छत्तीसगढ़ की कोसा सिल्क और ढोकरा शिल्प, ओडिशा की संबलपुरी साड़ियां एवं सौरा चित्रकला, मध्य प्रदेश के बाग प्रिंट, महेश्वरी साड़ियां और गोंड चित्रकला, पश्चिम बंगाल की कांथा कढ़ाई वाली साड़ियां, राजस्थान के पारंपरिक वस्त्र एवं आभूषण, झारखंड के जूट उत्पाद, पूर्वोत्तर राज्यों की बांस-बेंत की कारीगरी, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड के बांस उत्पाद तथा अराकू कॉफी जैसे विशेष उत्पाद प्रदर्शित हैं।
कार्यक्रम में विशेष अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ की प्रबंध संचिका एवं अपर प्रधान वन संरक्षक संगीता गुप्ता, ट्राइफेड के क्षेत्रीय प्रबंधक संदीप शर्मा सहित संबंधित विभागों के अधिकारी, शिल्पकार, कारीगर और जनजातीय कलाकार उपस्थित थे।
मंत्री नेताम ने ट्राइफेड और आयोजकों को आयोजन की सफलता की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि ऐसे आयोजन जनजातीय कला और संस्कृति के संरक्षण के साथ-साथ कारीगरों की आर्थिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करेंगे। ट्राइफेड ने नागरिकों से 2 नवंबर तक टाउन हॉल पहुंचकर जनजातीय कारीगरों के उत्पाद खरीदने और देश की समृद्ध जनजातीय विरासत के संरक्षण में योगदान देने की अपील की है।




