Child Denied Admission for Speaking Surgujiha: सरगुजा:अंबिकापुर: 18 अप्रैल 2026: सरगुजा संभाग की राजधानी अंबिकापुर में अब स्कूल भी भाषा और वर्ग के चुनाव की फ़ाइल बन गया है। प्री‑प्रायमरी में एडमिशन के लिए लाया गया साढ़े 3 साल का बच्चा सिर्फ इसलिए नाकाम रहा क्योंकि वह सरगुजिहा बोलता था। परिजनों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन ने साफ‑साफ कह दिया कि “यहां बड़े घरों के बच्चे पढ़ते हैं, जो हिंदी में बात करते हैं। अगर आपका बच्चा सरगुजिहा में बोलता रहेगा तो बाकी छात्र भी वही बोली सीख जाएंगे, जो स्कूल के माहौल के अनुकूल नहीं है।” इस घटना ने न सिर्फ अंबिकापुर की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि क्षेत्रीय भाषा और सामाजिक भेदभाव के मुद्दे को नए लेवल पर उठा दिया है।
आरोप: भाषा को ही बनाया बाधा
जानकारी के मुताबिक, अंबिकापुर के राजकुमार यादव अपने ढाई साल के बेटे को एक निजी प्ले‑स्कूल में एडमिशन दिलाने पहुंचे थे। उन्होंने बताया कि 2 अप्रैल से लगभग एक सप्ताह तक बच्चा डेमो क्लास में बैठा, लेकिन बाद में प्रिंसिपल ने सीधे तौर पर कह दिया कि अब बच्चे को स्कूल न भेजें क्योंकि वह सरगुजिहा बोली में ही बात करता है। पिता का कहना है कि जब उन्होंने आपत्ति जताई तो प्रबंधन ने यह साफ इशारा दिया कि स्कूल में अमीर या बड़े घरों के बच्चे पढ़ते हैं, उनके लिए सरगुजिहा का “माहौल” उचित नहीं माना गया।
स्थानीय भाषा बोलने को ही एडमिशन की बाधा बनाने का यह मामला सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद NSUI और अन्य छात्र संगठनों ने विरोध जताते हुए स्कूल के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
घटना के बाद पीड़ित परिवार ने सीधे अंबिकापुर कलेक्टर से शिकायत की। सूत्रों के मुताबिक, जिला मुख्यालय ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए डीईओ को जांच के आदेश जारी किए और संबंधित स्कूल की रजिस्ट्रेशन और एडमिशन से जुड़े दस्तावेजों की जांच करने को कहा। शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने खुलेआम कहा कि भाषा के आधार पर बच्चे को एडमिशन से वंचित रखना गलत है और यदि शिकायत सही पाई गई तो संबंधित स्कूल के खिलाफ कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई होगी।
इस बीच स्थानीय स्तर पर बहुतायत में लोगों ने यह सवाल उठाया कि यदि उच्चपढ़े‑लिखे वर्ग अपनी भाषा को “ऊपर” की भाषा मानते हैं तो सरगुजिहा जैसी क्षेत्रीय बोली को समाज की मुख्यधारा से किस तरह जोड़ा जाएगा।
टीएस सिंहदेव का बयान: “ऐसे स्कूल बंद कर देना चाहिए”
सरगुजिहा बोलने पर बच्चे को एडमिशन न दिए जाने का मामला राजनीतिक सतह पर भी पहुंच गया। पूर्व डिप्टी मुख्यमंत्री और प्रदेश के वरिष्ठ नेता टीएस सिंहदेव ने मामले पर गहरी नाराजगी जताते हुए कहा कि यदि किसी बच्चे को सरगुजिहा बोलने के कारण ही एडमिशन नहीं दिया जा रहा है, तो ऐसे स्कूल को बंद कर देना चाहिए। उन्होंने इस घटना को “सामाजिक भेदभाव” और “सांस्कृतिक घृणा” का नतीजा बताया और शिक्षा विभाग से सख्त जांच व कार्रवाई की मांग की।
सिंहदेव के बयान ने इस विवाद को और व्यापक बना दिया। लोगों में यह उम्मीद बढ़ी कि अब सिर्फ स्थानीय स्तर पर शिकायत व निंदा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शिक्षा विभाग के स्तर पर नीतिगत दृष्टिकोण तय हो सकता है।
Child Denied Admission for Speaking Surgujiha क्या बदलेगा अब मामला?
टीएस सिंहदेव के “स्कूल बंद कर देना चाहिए” जैसे बयान से न सिर्फ जनता कर दबाव बढ़ गया है, बल्कि शिक्षा विभाग के लिए भी यह साफ संकेत है कि भाषा आधारित भेदभाव को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। माना जा रहा है कि जांच रिपोर्ट के आधार पर स्कूल के खिलाफ चेतावनी, नोटिस या फिर लाइसेंस निलंबन जैसी सख्त कार्रवाई हो सकती है, जिससे भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोकने का संकेत मिलेगा।
साथ ही, स्थानीय स्तर पर चर्चा यह भी तेज हो रही है कि शिक्षा नीति में सरगुजिहा जैसी क्षेत्रीय भाषाओं को कक्षाओं में सम्मानपूर्वक जगह दी जाए, ताकि बच्चों को अपनी मातृभाषा पर शर्म न महसूस हो, बल्कि गर्व दिखाई दे। अंबिकापुर का यह छोटा‑सा एडमिशन विवाद अब सरगुजा संभाग की सांस्कृतिक पहचान, भाषाई सम्मान और शिक्षा के लोकतांत्रिक स्वरूप पर चल रही बड़ी बहस का प्रतीक बन चुका है।
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