End the TET requirement for serving teachers, a movement to remove the TET in Raipur: रायपुर : 17 फरवरी 2026 : छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा इन दिनों जोरों पर है। सेवारत शिक्षकों के लिए टीईटी (टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट) की अनिवार्यता समाप्त करने की मांग को लेकर विभिन्न शिक्षक संगठनों ने ‘टीईटी हटाओ आंदोलन’ शुरू कर दिया है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत लागू इस प्रावधान के खिलाफ लाखों शिक्षक सड़कों पर उतर आए हैं। संगठनों का आरोप है कि इस अनिवार्यता से देशभर में करीब 25 लाख से अधिक सेवारत शिक्षक प्रभावित हो रहे हैं, जिससे शिक्षा क्षेत्र में असंतोष और आक्रोश की लहर फैल रही है।
शिक्षक संगठनों के नेताओं ने बताया कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) द्वारा संचालित टीईटी परीक्षा को 2011 में शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों के लिए अनिवार्य कर दिया गया था। इसका उद्देश्य शिक्षकों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना था, लेकिन संगठनों का कहना है कि यह प्रावधान अब अन्यायपूर्ण साबित हो रहा है। रायपुर के नेहरू चौक पर आयोजित एक विशाल धरना प्रदर्शन में हजारों शिक्षकों ने भाग लिया। उन्होंने बैनर और पोस्टर के माध्यम से सरकार से मांग की कि पहले से सेवा दे रहे शिक्षकों को इस परीक्षा से छूट दी जाए।
प्रमुख शिक्षक संगठन छत्तीसगढ़ प्रदेश शिक्षक संघ के अध्यक्ष रामेश्वर साहू ने कहा, “टीईटी मूल रूप से नई भर्ती वाले शिक्षकों के लिए थी, लेकिन सेवारत शिक्षकों पर इसे थोपना अन्याय है। ये शिक्षक वर्षों से स्कूलों में सेवा दे रहे हैं, छात्रों को पढ़ा रहे हैं। अब उनकी मेहनत पर सवाल उठाना उचित नहीं।” साहू ने आंकड़े पेश करते हुए बताया कि छत्तीसगढ़ में ही 50 हजार से अधिक शिक्षक इस प्रावधान से प्रभावित हैं। यदि टीईटी पास न करने पर नौकरी पर संकट आया तो ग्रामीण स्कूलों में शिक्षकों की कमी हो जाएगी, जिसका खामियाजा बच्चों को भुगतेना पड़ेगा।
आंदोलन की शुरुआत पिछले महीने हुई जब रायपुर जिला प्रशासन ने कुछ स्कूलों में टीईटी प्रमाण-पत्र जमा करने का नोटिस जारी किया। इससे शिक्षक समुदाय में रोष फैल गया। संगठनों ने स्कूल शिक्षा विभाग को ज्ञापन सौंपा, लेकिन कोई राहत न मिलने पर धरना-प्रदर्शन का रुख अपनाया। रायपुर के अलावा बिलासपुर, दुर्ग और रायगढ़ जैसे जिलों में भी समर्थन प्रदर्शन हो रहे हैं। महिल शिक्षिकाओं ने विशेष रूप से हिस्सा लिया, क्योंकि कईयों ने घर-परिवार संभालते हुए वर्षों सेवा की है। एक शिक्षिका ने कहा, “हमने बीएड और डीएड किया है, अनुभव है। टीईटी एक अतिरिक्त बोझ क्यों?”
टीईटी प्रणाली में सुधार जरूरी है। हालांकि, इसके पक्ष में भी तर्क हैं। स्कूल शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने गुप्त रूप से बताया कि टीईटी शिक्षकों की योग्यता जांचने का एक मानक उपकरण है। अधिनियम की धारा 23 के तहत प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर सभी शिक्षकों के लिए यह अनिवार्य है। लेकिन सेवारत शिक्षकों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था जैसे कार्यशाला या आंतरिक मूल्यांकन की मांग उठ रही है। केंद्र सरकार ने भी समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए हैं, लेकिन राज्य स्तर पर अमल में कमी है।
यह आंदोलन केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी इसी तरह के प्रदर्शन हो चुके हैं। राष्ट्रीय शिक्षक संघ ने दिल्ली में भी इस मुद्दे को उठाया है। छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा मंत्री विजय शर्मा ने कहा है कि मांग पर विचार किया जाएगा। उन्होंने एक बैठक बुलाई है जिसमें संगठनों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया है। लेकिन शिक्षक नेता संतुष्ट नहीं हैं। वे आश्वासन से आगे ठोस कदम चाहते हैं।
आंदोलन के प्रभाव से ग्रामीण स्कूल प्रभावित हो रहे हैं। कई शिक्षक छुट्टी पर चले गए हैं, जिससे कक्षाएं खाली हैं। अभिभावक संगठनों ने भी समर्थन जताया है, क्योंकि शिक्षक कमी से बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही है। एक अभिभावक ने कहा, “शिक्षक हमारे बच्चे हैं। उनकी मांग जायज है। सरकार को जल्द समाधान निकालना चाहिए।” विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि डिजिटल मूल्यांकन या ऑनलाइन टीईटी जैसी व्यवस्था लागू हो, ताकि बोझ कम हो।
टीईटी विवाद शिक्षा व्यवस्था की गहरी समस्याओं को उजागर करता है। देश में 12वीं पंचवर्षीय योजना के बाद शिक्षक भर्ती ठप हो गई, जिससे ड्यूटी पर अतिरिक्त भार पड़ा। कोविड काल में ऑनलाइन शिक्षा ने शिक्षकों को नई चुनौतियां दीं। अब टीईटी ने आग में घास डाल दी। यदि मांग पूरी न हुई तो आंदोलन और तेज होगा। हड़ताल की चेतावनी दी गई है। सरकार के सामने कठिन परीक्षा है। क्या यह आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर फैलेगा? समय ही बताएगा।
End the TET requirement for serving teachers, a movement to remove the TET in Raipur
शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 ने निश्चित रूप से प्रगति की, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। ग्रामीण भारत में योग्य शिक्षकों की कमी बनी हुई है। टीईटी को वैकल्पिक बनाकर अनुभव को प्राथमिकता देना एक समाधान हो सकता है। रायपुर का यह आंदोलन पूरे देश के लिए संदेश है। सरकार को संवाद से मुद्दा सुलझाना होगा, वरना शिक्षा का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।
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