Smugglers fell huge trees in Semersot Sanctuary: बलरामपुर:सेमरसोत अभयारण्य, जो छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में स्थित है, पिछले कुछ समय से अवैध कटाई और लकड़ी तस्करी का प्रमुख केंद्र बन चुका है। यहाँ के सागौन और साल के विशाल पेड़ों की कटाई रात के अंधेरे में हो रही है, जिसमें आधुनिक मशीनों का उपयोग कर बड़े पैमाने पर पेड़ों को गुमनाम तरीके से काटा जा रहा है। ग्रामीणों की शिकायतों के बाद इस गंभीर मुद्दे को प्रमुखता से उठाया, जिससे वन विभाग की नींद खुली और विभाग के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे।
यहाँ की परिस्थिति एक तरह से फिल्म ‘पुष्पा’ जैसी मानी जा रही है, जहां जंगल खोटे खेल का शिकार हो रहा है। अभयारण्य के अंतर्गत ग्राम कंडा सहित आसपास के इलाकों में तस्कर विशाल पेड़ों को काटकर रात में ही चारपहिया वाहनों से बाहर ले जा रहे हैं। वहीं, वन विभाग के अधिकारी इस कटाई के बारे में जानते हुए भी अभी तक प्रभावी निगरानी स्थापित नहीं कर पाए हैं। वनकर्मियों की कम संख्या, उनके लिए आवास और गश्त की कमी इस गंभीर समस्या को और बढ़ा रही है।
ग्रामीणों का आरोप है कि वन विभाग में यँहा तस्करों और कुछ अधिकारियों के बीच मिलीभगत की संभावना है, क्योंकि इतनी बड़ी कटाई बिना विभाग की चुप्पी के संभव नहीं लगती। जंगल से साधारण वनोपज जैसे दातून तक के संग्रह पर कड़ी पाबंदी होती है और ग्रामीणों को कार्रवाई का सामना करना पड़ता है, लेकिन तस्करों के लिए अभयारण्य में कटाई खुली छूट मिला हुआ है।
वन विभाग ने तस्करों को पकड़ने के लिए तमोर-पिंघला टाइगर रिजर्व से डॉग स्क्वाड बुलाकर अभियान तेज कर दिया है। अज्ञात आरोपियों के खिलाफ भारतीय वन अधिनियम 1927 और वन्यप्राणी संरक्षण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है और नष्ट किए गए लकड़ी के टुकड़ों को निस्तार डिपो बलरामपुर लाया गया है।
स्थानीय अधिकारियों का दावा है कि जंगल के संवर्धन के लिए भी कार्य किया जा रहा है और गश्त बढ़ाई गई है, लेकिन गहन जांच में यह पता चला है कि संवर्धन की गतिविधियां नाम मात्र हैं और जंगल में गश्त भी सामान्य है। लगातार पेड़ों की कटाई का सिलसिला विभाग की कागजी कार्रवाई के तौर पर ही चलता रहता है, जिससे गाँव के लोग बहुत निराश हैं।
सेमरसोत अभयारण्य में यह कोई नया मामला नहीं है। पहले भी कई बार शिकायतें और जांच हुईं, लेकिन सभी में विभाग ने न तो ठोस कार्रवाई की और न ही मामलों पर गंभीरता दिखाई। शिकायतों को दरकिनार करते हुए वर्षो तक फाइलें ठंडे बस्ते में रखी गईं, जिससे तस्करी और कटाई के मामले रोज बढ़ते गए।
ग्रामीण राधेश्याम श्रीवास्तव का कहना है कि पेड़ों की कटाई का यह खेल केवल पर्यावरण का नुकसान ही नहीं है, बल्कि यह लाखों रुपये की राजस्व हानि भी है, जिसमें कई प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत भी शामिल हो सकती है। उन्होंने इस प्रकरण में निष्पक्ष और कठोर जांच की मांग की है।
वन विभाग अब तक इस मामले में क्षेत्रीय निगरानी कार्यों और तस्करों के खिलाफ सख्त अग्रिम कार्रवाई कर रहा है। हालांकि ग्रामीणों और पर्यावरणविदों का मानना है कि विभाग की चुप्पी और मिलीभगत से यह अपराध व्यापक स्तर पर होता चला जा रहा है। पेड़ों की कटाई से न केवल स्थानीय जैव विविधता को खतरा है, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन भी बिगड़ रहा है।
Smugglers fell huge trees in Semersot Sanctuary
इस संकट के समाधान के लिए आवश्यक है कि वन विभाग अधिक सक्रिय और पारदर्शी हो। प्रभावी गश्त, पूरे क्षेत्र के निरंतर मॉनिटरिंग और तस्करों के हराने की ठोस रणनीति बनाने की जरूरत है। साथ ही ग्रामीणों और संरक्षण कार्यकर्ताओं को भी संरक्षण कार्यों में शामिल कर जंगल की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
सेमरसोत अभयारण्य की इस पेड़ों की कटाई और तस्करी की समस्या से पूरे क्षेत्र की जैव विविधता और पर्यावरण प्रभावित हो रहा है। राज्य और केंद्र सरकार की ओर से भी इस क्षेत्र को विशेष संरक्षण कवच देने की मांग उठ रही है ताकि भविष्य में इस तरह की कटाई और अवैध कार्यों पर नियंत्रण पाया जा सके।
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