TS Singhdev strongly objected to teachers being given the responsibility of monitoring stray dogs in Ambikapur: सरगुजा:अंबिकापुर।छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता त्रिभुवनेश्वर शरण (टीएस) सिंहदेव ने राज्य के स्कूल शिक्षकों को आवारा कुत्तों की निगरानी का दायित्व सौंपे जाने के फैसले पर कड़ी आपत्ति दर्ज की है। उन्होंने साफ कहा कि शिक्षकों की प्राथमिक और मुख्य जिम्मेदारी केवल बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है, न कि उन्हें प्रशासनिक और गैर-शैक्षिक कार्यों में उलझाना। इस निर्णय को “गलत दिशा में उठाया गया कदम” बताते हुए सिंहदेव ने मांग की कि सरकार तत्काल इस आदेश को वापस ले और शिक्षकों को उनके मूल कार्य पर ही केंद्रित रहने दिया जाए।
सिंहदेव ने अपने बयान में जोर देकर कहा कि किसी भी आदर्श शिक्षा व्यवस्था में शिक्षक का समय और ऊर्जा पूरी तरह कक्षा में पढ़ाई, बच्चों के मार्गदर्शन और शैक्षिक माहौल को बेहतर बनाने में लगनी चाहिए। उनके अनुसार, जब शिक्षकों पर इस तरह के अतिरिक्त दायित्व थोपे जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से पढ़ाई पर नकारात्मक असर पड़ता है और बच्चों के सीखने की गुणवत्ता प्रभावित होती है। उन्होंने यह भी कहा कि स्कूल शिक्षा पहले से ही कई चुनौतियों से जूझ रही है, ऐसे में शिक्षकों को गैर-शैक्षिक कार्यों में व्यस्त रखना शिक्षा के हित में नहीं माना जा सकता।
कथित आदेश के अनुसार, शिक्षकों को अपने क्षेत्र या स्कूल परिसर के आसपास आवारा कुत्तों की पहचान, उनकी गतिविधियों पर नजर रखने और संबंधित प्रशासनिक इकाइयों को इसकी सूचना देने जैसी जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य कथित तौर पर बच्चों की सुरक्षा और कुत्तों के कारण होने वाली संभावित घटनाओं को रोकना बताया जा रहा है। हालांकि, विरोध करने वालों का तर्क है कि यह काम स्थानीय निकायों, नगरीय प्रशासन, पशु चिकित्सा विभाग या संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी है, न कि स्कूलों के शिक्षकों की। शिक्षा से इतर ऐसी जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ने से शिक्षकों के नियमित शैक्षिक कार्यक्रम, क्लासरूम तैयारी, कॉपी जाँच और बच्चों की व्यक्तिगत निगरानी पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
टीएस सिंहदेव ने अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए साफ कहा कि शिक्षकों को शैक्षिक कार्यों से इतर किसी अन्य काम में नहीं लगाया जाना चाहिए, सिवाय उन विशेष परिस्थितियों के जब राष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक कार्य हों, जैसे जनगणना, मतदाता सूची से जुड़े सीमित कार्य या आपदा की स्थिति में अस्थायी सहयोग। उन्होंने कहा कि संविधान और नीतिगत दस्तावेजों में भी शिक्षा को मूल अधिकार और शिक्षक को उसके केंद्र में माना गया है, लेकिन जमीनी स्तर पर बार-बार देखा गया है कि शिक्षकों को चुनावी ड्यूटी, सर्वे, विभिन्न योजनाओं के फॉर्म भरने और अब आवारा कुत्तों की निगरानी जैसे कार्यों में लगा दिया जाता है। इस प्रवृत्ति को रोकना जरूरी है, तभी बच्चों के हित में वास्तविक सुधार हो सकेगा।
सिंहदेव का तर्क है कि जब सरकारें स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, नामांकन बढ़ाने, ड्रॉपआउट कम करने और सीखने के स्तर को ऊंचा उठाने की बात करती हैं, तो सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षक को गैर-जरूरी बोझ से मुक्त रखा जाए। शिक्षकों का दिन भर का समय यदि फील्ड रिपोर्ट, सर्वे सूची, मीटिंग और अब कुत्तों की निगरानी जैसे कार्यों में चला जाएगा, तो वे पाठ योजना, रिवीजन, कमजोर बच्चों पर अतिरिक्त ध्यान और रचनात्मक गतिविधियों के लिए समय कैसे निकाल पाएंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस तरह के निर्णय जारी रहे तो शिक्षण पेशे का आकर्षण भी कम होगा और समाज में शिक्षक की गरिमा पर भी सवाल उठेंगे।
इस मुद्दे को उठाते हुए टीएस सिंहदेव ने सरकार से यह भी पूछा कि जब नगरीय निकायों, पंचायतों, पशु चिकित्सा विभागों और स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों के पास अपना-अपना स्टाफ और संसाधन हैं, तो फिर उनकी जिम्मेदारी शिक्षकों पर क्यों डाली जा रही है। उन्होंने कहा कि आवारा पशुओं की समस्या गंभीर जरूर है, लेकिन उसका समाधान शिक्षा व्यवस्था के स्तंभों पर अतिरिक्त बोझ डालकर नहीं खोजा जा सकता। इसके लिए अलग से टीम, पशु-पकड़ने वाली इकाइयाँ, वैक्सीनेशन ड्राइव और स्थानीय स्तर पर समन्वित योजना बनाई जानी चाहिए, जबकि शिक्षक केवल यह सुनिश्चित करें कि स्कूल के भीतर बच्चों की पढ़ाई और सुरक्षा व्यवस्थित रूप से चले।
सिंहदेव ने यह भी रेखांकित किया कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में पहले ही शिक्षकों की संख्या अपेक्षा से कम है और कई स्कूल एक ही या दो शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे में यदि उन्हीं शिक्षकों को स्कूल से बाहर के कामों में उलझाया जाएगा, तो कक्षा विभाजन, विषयवार पढ़ाई और समय पर पाठ्यक्रम पूरा कराना और कठिन हो जाएगा। उन्होंने सुझाव दिया कि सरकार को शिक्षकों की वास्तविक स्थिति, स्कूलों में उपलब्ध संसाधन, बच्चों की संख्या और शैक्षिक चुनौतियों का समग्र मूल्यांकन कर नीति बनानी चाहिए, न कि तात्कालिक प्रशासनिक सुविधाओं के लिए शिक्षकों को “मल्टी-टास्किंग कर्मचारी” की तरह देखा जाए।
इस संदर्भ में उन्होंने यह भी याद दिलाया कि वर्षों से शिक्षक संगठन भी यह मांग उठाते रहे हैं कि उन्हें गैर-शैक्षिक कार्यों से मुक्त किया जाए। कई बार ऐसे आदेशों के खिलाफ प्रदेश भर में धरना, प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपे गए हैं, लेकिन समय-समय पर नई किस्म के असंबंधित कार्य फिर शिक्षकों पर डाल दिए जाते हैं। टीएस सिंहदेव का मानना है कि यदि सरकार वास्तव में शिक्षा सुधार को लेकर संजीदा है, तो सबसे पहले शिक्षक संगठनों के साथ संवाद कर उनकी समस्याओं को समझे और एक स्पष्ट प्रोटोकॉल जारी करे कि शिक्षक किन-किन परिस्थितियों में, कितने समय के लिए और किस हद तक गैर-शैक्षिक कार्यों में लगाए जा सकते हैं।
TS Singhdev strongly objected to teachers being given the responsibility of monitoring stray dogs in Ambikapur
टीएस सिंहदेव ने आवारा कुत्तों की समस्या के मानवीय और व्यावहारिक समाधान की भी जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि शहरों और कस्बों में आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ने से बच्चों, बुजुर्गों और आम नागरिकों में भय का माहौल पैदा होता है, काटने के मामले भी बढ़ते हैं और स्वास्थ्य संबंधी खतरे सामने आते हैं। इसलिए, एक समन्वित नीति के तहत नसबंदी, टीकाकरण, पशु-कल्याण संगठनों की भागीदारी और नगरपालिका स्तर पर नियमित निगरानी जैसे उपाय किए जाने चाहिए। यह कार्य लंबे समय की योजना, बजट और प्रशिक्षित स्टाफ के सहारे ही हो सकता है, न कि स्कूल शिक्षकों की ड्यूटी बढ़ाकर।
उन्होंने अपने बयान के अंत में दो टूक कहा कि शिक्षक समाज निर्माण की रीढ़ हैं और उनकी भूमिका को सीमित, कमजोर या भंगुर नहीं किया जाना चाहिए। जब शिक्षक को सम्मान, स्थिरता और स्पष्ट दायित्व मिलता है, तभी वह अगली पीढ़ी को बेहतर नागरिक बनाने में पूरी ईमानदारी से योगदान दे पाता है। आवारा कुत्तों की निगरानी जैसे कार्यों में उन्हें लगाना न केवल शिक्षा की मूल भावना से भटकाव है, बल्कि यह शिक्षक की पेशेवर गरिमा के भी प्रतिकूल है। इसलिए, उन्होंने सरकार से अपील की कि इस तरह के निर्णयों पर पुनर्विचार करते हुए तुरंत आदेश वापस ले, शिक्षकों को उनके मूल कर्तव्य—बच्चों की शिक्षा और व्यक्तित्व निर्माण—पर पूरी तरह केंद्रित रहने दिया जाए और भविष्य में भी उन्हें गैर-जरूरी अतिरिक्त बोझ से बचाया जाए।
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