Life Line Hospital Broke Ayushman: सरगुजा :पांचवी अनुसूची क्षेत्र सरगुजा में ‘आयुष्मान भारत योजना’ के नाम पर गरीबों की जेब खाली करने का गोरखधंधा अब खुलेआम हो रहा है। अंबिकापुर के लाइफ लाइन अस्पताल पर गंभीर आरोप लगे हैं कि उसने योजना के अंतर्गत इलाज होने के बावजूद मरीज से लाखों रुपये की वसूली की। पीड़ित के परिजन ने दिनांक 19 मई को कोतवाली थाना,जिला कलेक्टर सरगुजा और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी सरगुजा को से इस मामले की लिखित शिकायत कर दी है। साथ ही स्वास्थ्य विभाग से न्याय की मांग की है।
Life Line Hospital Broke Ayushman क्या है पूरा मामला ?
ग्राम पंचायत रामनगर, थाना बिश्रामपुर, जिला सूरजपुर निवासी श्रीमती राजकुमारी को 11 फरवरी 2025 को सीने में दर्द की शिकायत पर जिला अस्पताल सूरजपुर से अंबिकापुर रेफर किया गया। परिजनों ने उन्हें लाइफ लाइन अस्पताल, अंबिकापुर में रात करीब 9 से 10 बजे के बीच भर्ती कराया। हालांकि, मरीज के पास आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का कार्ड (मेंबर आईडी: PO62V1T6G) था और सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, अस्पताल द्वारा इस कार्ड पर दो बार इलाज का लाभ लिया गया:
- 12.02.2025 से 17.02.2025 तक — मेडिकल केस में ₹50,000 की स्वीकृति
- 17.02.2025 से 20.02.2025 तक — सर्जिकल केस में ₹72,200 की स्वीकृति
इसके बावजूद, 12 फरवरी की रात 10 बजे, अस्पताल प्रबंधन ने मरीज के परिजनों से ₹40,000 नकद लेकर “MIREL for intravenous use only” इंजेक्शन लगाया। इसके अलावा, अन्य दवाओं के ऑनलाइन और ऑफलाइन बिल भी वसूले गए।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सर्जरी 16 फरवरी को कर दी गई, जबकि आयुष्मान कार्ड पर सर्जिकल लाभ की ब्लॉकिंग तारीख 17 फरवरी से दर्शाई गई है। इलाज समाप्ति के बाद अस्पताल द्वारा परिजनों से ₹1,60,330/- नकद भुगतान की मांग की गई।जब परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन से यह सवाल किया कि जब इलाज आयुष्मान योजना के अंतर्गत संभव था, तो फिर नकद राशि क्यों ली गई, तो जवाब मिला कि “टेक्निकल इशू” के कारण कार्ड समय पर ब्लॉक नहीं हो पाया। यह मामला न केवल आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है, बल्कि निजी अस्पतालों द्वारा गरीब मरीजों के शोषण की कहानी भी बयां करता है। इस मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग उठ रही है ताकि दोषी अस्पतालों पर कार्रवाई हो सके और भविष्य में मरीजों को इस प्रकार की परेशानी न झेलनी पड़े।
कौन है शिकायतकर्ता दीपक मानिकपुरी – वे एक जागरूक और समर्पित युवा समाजसेवी हैं, जो छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल पांचवीं अनुसूची क्षेत्र सरगुजा संभाग में शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे हैं। उनका उद्देश्य न केवल स्थानीय लोगों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना है, बल्कि क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी निरंतर संघर्ष करना है।
दीपक मानिकपुरी ने विशेष रूप से स्वास्थ्य व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर कर कई बड़े कदम उठाए हैं। उनके अथक प्रयासों और जनहित में उठाई गई आवाज के परिणामस्वरूप एक भ्रष्ट चिकित्सक को जिला अस्पताल से बर्खास्त भी किया गया, जो उनके साहसिक और निडर व्यक्तित्व का परिचायक है। इसके साथ ही, वे शैक्षणिक जागरूकता फैलाने के लिए भी निरंतर प्रयासरत हैं। आदिवासी समुदाय के बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने, स्कूलों की स्थिति सुधारने और शिक्षकों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में उनका योगदान उल्लेखनीय है।
एक ही मरीज पर दो डॉक्टरों के उलझे बयान से उठे गंभीर सवाल- आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत इलाज करवा रही एक महिला मरीज के सर्जरी के बाद दो वरिष्ठ डॉक्टरों के अलग-अलग बयानों ने परिजनों को असमंजस और आक्रोश में डाल दिया है। मामला सर्जरी के दो दिन बाद तब गरमा गया, जब रायपुर के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. सूर्यवंशी ने सर्जरी के बाद बयान देते हुए कहा कि “हृदय में मौजूद ब्लॉकेज का सफल ऑपरेशन कर दिया गया है और अब मरीज पूरी तरह स्वस्थ है।”
लेकिन महज दो दिन बाद ही डॉ. असाटी का बयान सामने आता है, जिसमें उन्होंने कहा कि “अभी दो और ब्लॉकेज बाकी हैं, जिनकी सर्जरी एक महीने बाद की जाएगी।” यह सुनते ही मरीज के परिवार में भारी चिंता और नाराजगी फैल गई। दो वरिष्ठ डॉक्टरों के विपरीत बयानों से विवाद की स्थिति बन गई। आखिरकार करीब 24 घंटे की चर्चा और दबाव के बाद, दोनों डॉक्टरों ने आपसी सहमति से बयान दिया कि “हां, दो ब्लॉक और बाकी हैं।” सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब डॉक्टरों को पहले से जानकारी थी कि हृदय में तीन ब्लॉकेज हैं, तो क्यों सिर्फ एक का ही ऑपरेशन किया गया? और क्यों मरीज व उनके परिजनों से शेष दो ब्लॉकेज की जानकारी छिपाई गई?
परिजनों का आरोप है कि ऐसा जानबूझकर किया गया, ताकि मरीज को बार-बार भर्ती कर अस्पताल अधिक पैसे वसूल सके। उनका यह भी कहना है कि अस्पताल मरीज के स्वास्थ्य से अधिक मुनाफे में रुचि दिखा रहा है।इस मामले ने निजी अस्पतालों की मंशा और नैतिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जरूरत है कि ऐसी गतिविधियों की जांच हो और स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता लाई जाए, ताकि गरीब और जरूरतमंद मरीजों को उचित और ईमानदार इलाज मिल सके।
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